योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1506, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें७०२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
धाना जीव उर्मी के चौफेर घूमते रहे, परन्तु अपने निश्चय में और का और जानते रहे। जब तक स्वरूप का प्रमाद है, तब तक जगत् का अभाव नहीं होता और जब आत्मा का साक्षात्कार होता है, तब जगत् ब्रह्मरूप हो जाता है। जगत् कुछ बना नहीं, फुरने में भासित होता है। जैसे स्वप्न में अज्ञान में अनन्त जगत् दीखते हैं। यह फुरना परब्रह्म में हुआ है, जो फुरने में है, वह भी परब्रह्म है। कुछ बना नहीं—आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है। जैसे पत्थर की शिला ठोस होती है, वैसे ही आत्मतत्त्व चैतन्यघन है। जैसे आकाश और शून्यता में कुछ भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं। सब कल्पना परब्रह्मरूप है और ब्रह्म ही कल्पनारूप है। इस जड़ और चैतन्य में कुछ भेद नहीं। हे राजन् ! जिसको जगत् कहते हो, वह ब्रह्मसत्ता ही है। न कुछ उत्पन्न हुआ है और न प्रलय होता है-सब ब्रह्म ही है। जैसे पहाड़ में पत्थर के सिवा कुछ नहीं होता, वैसे ही यह जगत् ब्रह्मसत्ता के सिवा कुछ नहीं। जैसे पाषाण की पुतली पाषाणरूप ही है, वैसे ही यह जगत् ब्रह्मरूप ही है। एक सूक्ष्म अनुभवअणु में अनेक अणु होते हैं, जैसे एक पहाड़ में अनेक शिलाएँ होती हैं। हे राजन् ! जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, उनको जगत् ब्रह्मरूप भासित होता है और जो अज्ञानी हैं उनको नाना प्रकार भासित होता है। जगत् कुछ वस्तु नहीं है, परन्तु जब तक संकल्प है, तब तक जगत् फुरता है। जैसे रत्नों की चमक होती है, वैसे ही जगत् आत्मा का चमत्कार है। चैतन्य आत्मा के आश्रय में अनन्त सृष्टियाँ फुरती हैं, अतः सब सृष्टि आत्मरूप है। आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु नहीं। जो जाग्रत् पुरुष ज्ञानवान् हैं, उनको ब्रह्मरूप ही दिखता है और जो अज्ञानी हैं उनको नाना प्रकार का जगत् दिखता है।
हे राजन् ! कुछ लोग इसे शून्य कहते हैं कि अर्थात् यह शून्य ही है, और कुछ नहीं। कुछ इसको जगत् कहते हैं और कुछ ब्रह्म कहते हैं। जिस किसी को निश्चय होता है, उनको वैसा रूप दिखता है। आत्मरूपी चिन्तामणि है, जैसा-जैसा संकल्प उसमें फुरता है, वैसा-वैसा ही भासित होता है। सबका अधिष्ठान ब्रह्मसत्ता है। जैसा-जैसा उसमें