योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1507, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ७०३
निश्चय होता है, वैसा ही वैसा होकर भासित होता है । द्रष्टा, दर्शन, दृश्य—त्रिपुटी जो दिखती है, वह भी ब्रह्म होकर भासित होती है, द्वितीय कुछ वस्तु नहीं और जो कुछ दिखता है, वही अज्ञान है । हे राजन् ! जब तक वासना नष्ट नहीं होती, तब तक दुःख भी नहीं मिटते, और जब वासना मिट जाती है, तब सब जगत् ब्रह्मरूप अपनारूप ही भासित हो और रागद्वेष किसी में न रहता । जैसे स्वप्न में नाना प्रकार की सृष्टि दिखती है, जब पूर्व का स्वरूप स्मरण होता है तो सब रूप आप ही हो जाता है और रागद्वेष मिट जाता है, वैसे ही ज्ञानवान् को यह जगत् ब्रह्मरूप अपनारूप भासित होता है और विकार से रहित होता है । पूर्व, अपूर्व और अपर को विचारना कि यह शुभ है और यह अशुभ है और अशुभ का त्याग करना, यह गौण विचार है । जब-तक पूर्वापर विचार मन में रहता है, तब तक जीव जगत् में भटकता है और बँधा रहता है, क्योंकि शुभ-अशुभ दोनों जगत् में हैं । जब इनका विस्मरण हो जाय और सम्पूर्ण जगत् को भ्रममात्र जानकर आत्मपद में सावधान हो, तब जीव मुक्त होता है । इस जीव के बन्धन का कारण अपनी वासना ही है । जब तक जगत् में वासना होती है तब तक राग-द्वेष उपजता है और जीव उससे बँधा रहता है । जिनको जगत् के सुख-दुःख में रागद्वेष की भावना नहीं उपजती, और वासना भी नष्ट हो जाती है, उनको यह जगत् ब्रह्मरूप अपनारूप ही दिखता है और जगत् में दुःखदायक कुछ नहीं रहता । उनको सब ब्रह्म ही दिखता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे वटधानोपाख्यानवर्णनन्नाम द्विशताधिकद्वाविंशतितमस्सर्गः ॥ २२२ ॥
दशरथजी ने विपश्चित् से पूछा, हे भास ! तुम चिरकाल पर्यन्त जगत् में फिरते रहे हो । जिस प्रकार तुमने चेष्टा की है और जो देश, काल, पदार्थ देखे हैं, सो सब कहो । भास बोले, हे राजन् ! मैं जगत् को देखता फिरा हूँ और फिरता-फिरता थक गया हूँ, परन्तु देखने की इच्छा होने के कारण मुझको दुःख नहीं हुआ । जो कुछ मैंने चेष्टा की है और जो देखा है, वह कहता हूँ । हे राजन् ! मैंने बहुत जन्म पाये हैं,