योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1508, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें७०४ ❖ योगवाशिष्ठ ❖
और बहुत बार मृतक हुआ हूँ। बहुत बार शाप पाया है, ऊँच-नीच जन्म लिये हैं और मर-मर गया हूँ। बहुत ब्रह्माण्ड देखे हैं। परन्तु ये सब अग्नि-देवता के वर से देखे हैं। एक बार मैं वृक्ष हुआ और सहस्र वर्ष पर्यन्त फूल, फल, टाम से युक्त रहा। जब कोई काटता, तब मैं दुःखी होता और मेरे हृदय में पीड़ा होती। फिर वह शरीर छूटा तो मैं सुमेरु पर्वत पर सुवर्ण का कमल हुआ और वहाँ का जल पिया। फिर एक देश में पक्षी हुआ। सौ वर्ष पक्षी रहकर फिर सियाल हुआ। मुझे हाथी ने चूर्ण किया, उससे मृतक होकर फिर सुमेरु पर्वत पर सुन्दर मृग हुआ। देवता और विद्याधर मेरे साथ प्रीति करने लगे। कुछ काल में मरकर फिर देवताओं के वन में मातंग हुआ। वहाँ देवियाँ और विद्याधरियाँ मुझको स्पर्श करतीं और सुगन्ध लेती थीं। तब मैं देवताओं की स्त्री हुआ, फिर सिद्ध हुआ और मेरा वचन सत्य होने लगा। फिर मैंने और शरीर धरा और एक ब्रह्माण्ड नाँघ गया। इसी प्रकार कई ब्रह्माण्ड में नाँघ गया। तब एक ब्रह्माण्ड में जो आश्चर्य देखा, सो सुनो। वहाँ मैंने एक स्त्री देखी, जिसके शरीर में कई ब्रह्माण्ड थे। इससे मुझे आश्चर्य हुआ। फिर देश काल-क्रिया से पूर्ण कई त्रिलोकी देखीं। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब दिखता है, वैसे ही मुझको उसमें जगत् दिखे। तब मैंने उससे कहा, हे देवि ! तुम कौन हो और यह तुम्हारे शरीर में क्या है? देवी बोली, हे साधो ! मैं शुद्ध चितशक्ति हूँ और ये सब मेरे अङ्ग मेरे में स्थित हैं। मेरी क्या बात पूछनी है—यह सब जगत् जो तू देखता है चिद्रूप है। चैतन्य से भिन्न और कुछ नहीं। सबमें ब्रह्माण्ड (त्रिलोकी) स्थित है, सो अपना रूप ही है। जो अपने स्वभाव में स्थित हैं, उनको अपने ही में ये दिखते हैं और जो स्वरूप में स्थित नहीं हैं, उनको जगत् बाहर और अपने से भिन्न भासित होते हैं।
हे राजन् ! यह जगत् कुछ बना नहीं। जैसे स्वप्न की सृष्टि और गन्धर्व नगर दिखता है, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है। जैसे जल में तरङ्ग दिखता है, सो जलरूप है—तरङ्ग कुछ भिन्न वस्तु नहीं होते, वैसे ही सब जगत् चिद्रूप में भासित होता है, सो चैतन्य से भिन्न