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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1509, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1509

❁ निर्वाण प्रकरण ❁

$$७०५$$

कुछ नहीं । परन्तु जब स्वभाव में स्थित होकर देखोगे, तब ऐसे ही दिखेगा । और जो अज्ञानदृष्टि से देखोगे तो नाना प्रकार का जगत् दिखेगा । हे राजन् ! जब इस प्रकार उस देवी ने मुझसे कहा, तब मैं वहाँ से चला और आगे दूसरी सृष्टि में गया । वहाँ देखा कि सब पुरुष ही रहते हैं, स्त्री कोई नहीं । पुरुष से पुरुष उत्पन्न होते हैं । उससे भी आगे और सृष्टि में गया तो वहाँ न सूर्य था, न चन्द्रमा न तारे थे, न अग्नि, न दिन था और न रात्रि । जैसे चन्द्रमा, सूर्य और तारों का प्रकाश होता है वैसे ही सब अपने प्रकाश में प्रकाशित थे । उनको देखकर मैं आगे और सृष्टि में गया । वहाँ देखा कि आकाश ही से जीव उत्पन्न होकर आकाश ही में लीन होते हैं । इकट्ठे ही सब उपजते और इकट्ठे ही लीन हो जाते हैं । न वहाँ मनुष्य हैं, न देवता हैं, न वेद हैं, न शास्त्र हैं, न जगत् है—इनसे विलक्षण ही प्रकार है ।

हे राजन् ! इस प्रकार मैंने कई सृष्टियाँ देखी हैं, जो मुझको स्मरण आती हैं । आगे और सृष्टि में गया तो वहाँ देखा कि सब जीव एक समान हैं । न किसी को रोग है, न किसी को दुःख है—सब एक से गंगा के तीर पर बैठे हैं । हे राजन् ! एक और आश्चर्य मैंने देखा है, वह भी सुनो । एक सृष्टि में मैं गया तो वहाँ क्षीरसमुद्र मन्दराचल से मथा जाता था । एक ओर विष्णु भगवान् और देवता थे । मन्दराचल पर्वत रत्नों से जड़ा हुआ था । शेषनाग रस्सी की नाईं लिपटा हुआ था । मथने के लिए दूसरी ओर दैत्य लगे थे । बड़ा शब्द होता था । वह यह कौतुक देखकर मैं आगे गया तो एक और सृष्टि देखी, जहाँ मनुष्य आकाश में उड़ते फिरते थे और देवता मनुष्य की नाईं पृथ्वी पर विचरते और वेदशास्त्र जानते थे । हे राजन् ! एक और आश्चर्य मैंने देखा, वह भी सुनो । एक सृष्टि में मैं जा निकला तो वहाँ मन्दराचल पर्वत पर कल्पवृक्ष का वन था और उसमें मदनिका नाम की एक अप्सरा रहती थी । वहाँ जाकर मैं सो रहा तो ज्यों ही रात्रि का समय आया कि वह अप्सरा मेरे कण्ठ में आ लगी । मैंने जागकर उसको देखा और कहा कि हे सुन्दरी ! तूने मुझको किस निमित्त