योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1510, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें७०६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
जगाया ? में तो सुख से सो रहा था । उस अप्सरा ने कहा कि हे राजन! मैंने इसलिए तुमको जगाया है कि चन्द्रमा उदय हुआ है और चन्द्रकान्तमणि चन्द्रमा को देखकर बहेगी और नदी की नाईं प्रवाह चलेगा । ऐसा न हो कि उसमें तू बह जाय । हे दशरथ ! इस प्रकार उसने कहा ही था कि नदी का प्रवाह चलने लगा । तब वह अप्सरा उस प्रवाह को देखकर मुझे आकाश को ले उड़ी और पर्वत के ऊपर जहाँ गंगा का प्रवाह चलता था उसके तट पर मुझको बिठा-दिया । सात वर्ष पर्यन्त वहाँ रहकर में फिर एक और ब्रह्माण्ड में गया । देखा, वहाँ तारा, नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य कुछ भी न थे । उसको देखकर में और आगे गया । इसी प्रकार अनन्त ब्रह्माण्ड मैंने देखे ।
हे राजन ! ऐसा देश व ऐसी पृथ्वी, नदी और पहाड़ कोई न होगा, जिसको मैंने न देखा हो । ऐसी चेष्टा कोई न होगी, जो मैंने न की हो । कई शरीरों के सुख मैंने भोगे हैं; कितनों के दुःख भोगे हैं । वन, कन्दरा और गुप्त स्थानों में फिरकर सब देखा, परन्तु अग्निदेवता के वर को पाकर फिरता-फिरता में थक गया तो भी आगे ही चला गया । अनेक अविद्याकृत ब्रह्माण्ड भी देखे, परन्तु अब उनका अन्त यह पाया है कि यह जगत् भ्रममात्र है । मैंने शास्त्रों में सुना है कि यह जगत् है नहीं, तो भी दुःख देता है । जैसे बालक को अपनी परछाहीं में वेताल दिखता है, वैसे ही यह जगत् अविचार में दिखता और विचार में निवृत्त हो जाता है । एक आश्चर्य और सुनो । एक ब्रह्माण्ड में में गया तो वहाँ महाआकाश था । उस महाआकाश में गिरकर में पृथ्वी पर आ पड़ा और वहाँ सो गया । तब में महागाढ़ सुषुप्तिरूप हो गया । सब जगत् मुझे भूल गया । जब वह गाढ़ सुषुप्ति क्षीण हुई, तब एक स्वप्न देखा । उसमें तुम्हारा यह जगत् मुझको देख पड़ा । उसमें मुझको पहाड़, कन्दरा, देश और बहुत से गुप्त, प्रकट स्थान दिखे । जहाँ केवल सिद्धों की गति थी, वहाँ भी में गया और जहाँ सिद्धों की भी गति न थी, वहाँ भी में गया । इस प्रकार अनेक जगत् मैंने देखे, परन्तु आश्चर्य है कि स्वप्न की सृष्टि प्रत्यक्ष जाग्रत् की तरह दिखती थी और स्वप्न के