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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1511, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1511

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७०७


शरीर जाग्रत् में पड़े दिखते थे। इससे सब जगत् भ्रममात्र है और असत्य ही सत्य होकर दिखाई देता है। इस प्रकार देखकर मैं बड़े आश्चर्य में पड़ा हूँ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विपश्चित्कथावर्णनन्नाम द्विशताधिकत्रयोविंशतितमस्सर्गः॥ २२३ ॥

विपश्चित् बोले, हे राजन्! एक सृष्टि और भी मैंने देखी है, जो इसी महाआकाश में है—अर्थात् इस महाआकाश से भिन्न नहीं। जहाँ तुम्हारी भी गति नहीं। जैसे स्वप्न की सृष्टि कोई जाग्रत् में देखा चाहे तो नहीं दिखती, वैसे ही वह सृष्टि है। हे राजन्! पृथ्वी का एक स्थान मेरे देखते ही देखते परछाईं की नाईं फिरने लगा। फिर उस आकाश में वही पहाड़ की नाईं दिखने लगा। यहाँ तक कि मनुष्यों के शरीर और दशों दिशाओं को उसने ढक लिया और आकाश में भी बड़ा दिखने लगा। इससे आकाश में भी न समाता था। उसने सूर्य और चन्द्रमा को भी मेरे देखते ही देखते ढक लिया। फिर भूकम्प मा आया, मानो प्रलयकाल ही आ गया। तब मैंने अपने इष्ट अग्निदेवता की ओर देखकर प्रार्थना की कि हे भगवन्! तुम मेरी जन्म-जन्म रक्षा करते आये हो, इससे अब भी रक्षा करो; मैं नष्ट होता हूँ। तब अग्नि ने कहा, तू मत डर। फिर मैंने जब अग्नि में प्रवेश किया, तब अग्नि ने कहा कि मेरे वाहन पर सवार होकर मेरे स्थान को चल। फिर अग्निदेव मुझको अपने वाहन तोते पर चढ़ाकर आकाशमार्ग से तुरन्त ले उड़े। जब हम उड़े, तब पीछे से वह शव पृथ्वी पर गिरा। उसके गिरने से सुमेरु जैसे पर्वत भी पाताल को चले गये। वह महाशरीर सैकड़ों सुमेरु के समान गिरा। मन्दराचल, मलयाचल, अस्ताचल आदि जो बड़े-बड़े पर्वत थे, वे भी नीचे को धँस गये। पृथ्वी में गड्ढे पड़ गये। उसके शरीर के नीचे जो वृक्ष, मनुष्य, दैत्य, स्थावर, जङ्गम आये, वे सब नष्ट हो गये। बड़ा उपद्रव उदय हुआ। निदान उसके शरीर मे सब दिशा पूर्ण हो गई। उसके अङ्ग ब्रह्माण्ड के भी बाहर निकल गये। हे राजन्, दशरथ! इस प्रकार भयानक दशा देखकर मैं अपने इष्टदेव अग्नि से