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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1512, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1512

७०८ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

बोला कि हे देव ! यह उपद्रव क्योंकर हुआ ? यह सब क्या है और ऐसा शरीर क्यों पड़ा है ? आगे तो कोई भी ऐसा शरीर नहीं देखा-सुना ? अग्नि ने कहा, तू अभी चुप रह। यह सब वृत्तान्त मैं तुझसे कहूँगा, पर प्रथम इसको शान्त होने दे। इस प्रकार अग्नि कहते ही थे कि देवता विद्याधर गन्धर्व और सिद्ध आदि जितने स्वर्गवासी थे, वे सब आकर स्थित हुए और विचार करने लगे कि यह उपद्रव प्रलयकाल के बिना ही हुआ है । इसका नाश करने को देवीजी की आराधना करनी चाहिए । हे राजन् ? यों विचारकर वे देवी की स्तुति करने लगे कि हे देवि, शववाहिनी, चण्डिके ! हम तेरी शरण आये हैं, इस उपद्रव से हमारी रक्षा करो।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे महाशववृत्तान्तवर्णनंनाम द्विशताधिकचतुर्विंशतितमस्सर्गः ॥ २२४ ॥

विपश्चित् बोले, हे दशरथ ! उन देवताओं ने स्तुति करके शव की ओर जो देखा तो क्या देखते हैं कि मानों द्वीप उसके उदर में समा गये हैं, भुजाओं में सुमेरु आदिक पर्वत ढक गये हैं। उसके दूसरे अङ्ग ब्रह्माण्ड को भी नाँघ गये हैं, नाथ ही पाताल को भी गये हैं। निदान उनकी मर्यादा कहीं पाई नहीं जाती थी। एक ही अंग में पृथ्वी छिप गई। यह देखकर विद्याधर, गन्धर्व और सिद्ध आदि सम्पूर्ण नम्रवत् स्तुति करने लगे--हे अम्बे, चण्डिके ! अपने गण को साथ लेकर इस उपद्रव में हमारी रक्षा करो--हम तेरी शरण आये हैं। हे राजन् ! जब इस प्रकार स्तुति करके देवता आराधना करने लगे, तब चण्डिका आकाशमार्ग से यक्ष, बेताल, भैरव आदि अपने गणों को लेकर आई और जैसे मेघ सब दिशाओं को ढक लेता है, वैसे ही सब ओर से उनके गणों ने आकर आकाश को ढक लिया। चण्डिका ऐसे तेजस्वीरूप को रखे हुए चली आती थीं, मानों अग्नि की नदी चली आती हो। उनके लाल नेत्र, शिर पर पके केश और श्वेत दाँत थे। वह बड़े शस्त्र धारण किये थीं। कई कोटि योजन तक उनका विस्तार था। वह सब दिशा और आकाश अपने शरीर से आच्छादित किये, कण्ठ में