योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1513, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें✹ निर्वाण प्रकरण ✹
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मुण्डों की माला पहिने, मुरदे वाहन पर आरूढ़ थीं। परमात्मपद में उनकी स्थित थी। वह ऐसी महाप्रकाशमान थीं, मानो सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि आदि के प्रकाश को भी लज्जित कर रही थीं। वह हाथों में खड्ग, मूसल, ध्वजा, उखल आदि नाना प्रकार के शस्त्र धारण किये आकाश में तारागण की नाई गर्जती हुई गणों सहित इस प्रकार चली आती थीं, मानो समुद्र से निकली साक्षात् बड़वाग्नि चली आती हो।
जब वह निकट आईं, तब देवता फिर प्रार्थना करने लगे कि हे अम्बे! इसका नाश करो व अपने गणों को आज्ञा दीजिये कि इसका भक्षण करें। हम इसको देखकर बड़े शोक को प्राप्त हुए हैं और तेरी शरण हैं। इस उपद्रव से हमारी रक्षा करो। हे राजा दशरथ! जब इस प्रकार देवताओं ने कहा तब चण्डिका ने प्राणवायु को खींचा और शव में जितना रक्त था, वह सब पी गईं। जैसे समुद्र को अगस्त्यजी ने पी लिया था, वैसे ही उन्होंने रक्त पान किया। जब उससे देवी का उदर और अङ्ग सब पूर्ण हो गये और नेत्र लाल हो आये, तब देवी नृत्य करने लगीं। उनके सब गण उस शव को खाने लगे, कई मुख को खाने लगे, कई भुजा को, कई उदर को, कई वक्षःस्थल को, कई टाँगों को और कई चरणों को। इसी प्रकार उसके सब अंगों को गण खाने लगे। कई गण आँतें लेकर आकाश में सूर्य के मण्डल को गये। कई गण उस शव के अन्त पाने को उड़े, सो मार्ग ही में मर गये, परन्तु कहीं अन्त न पाया। देवी जो उस शव की ओर देखती थी इससे उसके नेत्रों से अग्नि निकलती थी। उस आग में मांस पकता था और गण भोजन करते थे। मांस पकने के समय जो शरीर से रक्त निकलता था, उससे मन्दराचल और हिमाचल पर्वत लाल हो गये—मानो पर्वतों ने भी लाल वस्त्र पहिने हों। रक्त की नदियाँ बहने लगीं। जो बड़े सुन्दर स्थान और दिशाएँ थीं, वे सब भयानक हो गईं। पृथ्वी के सब जीव नष्ट हो गये। पर जो पहाड़ की कन्दरा में जाकर छिप रहे थे, वे बच गये, शेष सब नष्ट हो गये। राम ने पूछा, हे भगवन्! तुम कहते हो कि उसके नीचे प्राणी आकर सब नष्ट हो