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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1514, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1514

७१० ☸ योगवाशिष्ठ ☸

गये और अंग उसके ऐसे कहते हो कि ब्रह्माण्ड को भी लाँघ गये । फिर कहते हो कि देवता बच रहे, इसका क्या कारण है ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो उसके शरीर और अंग के नीचे आये वे तो नष्ट हो गये, पर मुख और ग्रीवा में कुछ भेद है । जिसमें जो पोल है उसमें और गोदी और टाँग के नीचे पोल में तथा सुमेरु, मन्दराचल, उदयाचल और अस्ताचल पर्वतों की कन्दराओं के पोल में बैठे हुए देवता बच गये और जो अङ्ग के छिद्रों में रहे, वे भी बच रहे और कहने लगे कि बड़ा कष्ट है जो हमारे बैठने के कई स्थान नष्ट हो गये । हाय ! वे वृक्ष कहाँ गये, हमारा बरफ का पर्वत कहाँ गया, उनकी सुन्दरता कहाँ गई, वन और बगीचे कहाँ गये, चन्दन के वृक्ष कहाँ गये और वे जनों के समूह कहाँ गये, जो हमको यज्ञ करके पूजते थे ? वे ऊँचे वृक्ष कहाँ गये, जिनके फूल और टहनी ब्रह्मलोक तक जाती थीं ? वह क्षीरसमुद्र कहाँ गया, जिसके मथने से बड़ा शब्द हुआ था ? उसके पुत्र, अर्थात् उससे उत्पन्न रत्न, कल्पवृक्ष और चन्द्रमा कहाँ गये ? जम्बूद्वीप कहाँ गया, जिसमें जम्बू के रस की नदी बहती थी और सुवर्णवत् जल के भँवर उठते थे ? ईख के रस का समुद्र कहाँ गया ? हा कष्ट ! हा कष्ट ! शक्कर और मिसरी के पर्वत और अप्सराओं के विचरने के स्थान कहाँ गये ? पृथ्वी कहाँ गई ? वे नन्दनवन के स्थान कहाँ गये, जहाँ हम अप्सराओं के साथ विहार करते थे ? उन सबका अभाव हमको शूल सा चुभता है । जैसे फल को कण्टक चुभते हैं; वैसे ही उन वस्तुओं के आभासरूपी कण्टक हमको चुभते हैं । इसी प्रकार वे अति शोकवान हुए और कहने लगे- हा कष्ट ! हा कष्ट !

इधर विषयों का स्मरण करके देवता शोक करते थे और उधर उस शव के जितने अंग थे, उनको गणों ने भोजन कर लिया और उसमे अघाये । कुछ मेदा का पिण्ड शेष रह गया था, उसमें बहुत दुर्गन्ध हुई । उस पिण्ड की पृथ्वी हो गई । जिसमें उसका नाम मेदिनी हो गया । मोटे हाड़ों के सुमेरु आदि पर्वत हुए । तब ब्रह्माजी ने देखा कि सब विश्व शून्य सा हो गया है, तब उन्होंने संकल्प किया कि अब