योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1515, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇
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फिर मैं सृष्टि रचूँगा। निदान पहले की नाईं उन्होंने सृष्टि रची और जगत का सब व्यवहार उसी प्रकार चलने लगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे स्वयंमाहात्म्यवृत्तान्त वर्णनं-
नाम द्विशताधिकपञ्चविंशतितमस्सर्गः ॥ २२५ ॥
विपश्चित बोले, हे दशरथ ! जब यह सब हो रहा था, तब मैंने अपने इष्टदेवता से, जो तोते के वाहन पर सवार थे, प्रश्न किया कि हे महादेव ! सब जगत के ईश्वर और सब जगत के भोक्ता ! यह शव कौन था, कहाँ स्थित था और किस प्रकार गिरा ? अग्नि बोले, हे राजन् ! यह अनन्त त्रिलोकी जिसका आभास है, उससे इस शव का वृत्तान्त वर्णन हो सकता है। एक त्रिलोकी में इसका वृत्तान्त नहीं वर्णन हो सकता । हे राजन् ! एक परम आकाश है, जो चिन्मात्र पुरुष सर्वज्ञ, अनामय और अनन्त है। वह आत्मतत्त्व केवल अपने रूप में स्थित है, पर उसका जो आभास संवेदन फुरना है, वही किञ्चन होता है। वह जब किसी स्थान में फुरता है, तब ऐसी भावना होती है कि मैं तेज का अणु हूँ। उस भावना के कारण से वह चित् संवेदन अणु सा हो जाता है। जैसे कोई पुरुष सोया हो। और स्वप्न में अपने को मार्ग में चलता देखता हो, अथवा जैसे तुम स्वप्न में अपने को सोया हुआ देखो, वैसे ही चित्तसंवेदन ने अपने को अणु जाना। जैसे फुरना ब्रह्मा को हुआ है वैसे ही धूल के कण का भी अधिष्ठान में फुरना समान रूप से हुआ । जब उस अणु को शरीर की भावना होती है, तब अपने साथ शरीर देखता है। शरीर के होने से नेत्र आदि इन्द्रियाँ घनी होता हैं, तब यह शरीर अपने को और इन्द्रियों से मिला हुआ जानता है। जब अपनारूप जानकर जीव उनको ग्रहण करके इन्द्रियों से विषय को ग्रहण करता है, तब वही चिद्रूप जीव प्रमाद से आधाराधेय-भाव को मानता है। पर अधिष्ठानसत्ता में कुछ हुआ नहीं। वह अद्वैत-सत्ता ज्यों की त्यों अपने आपमें स्थित है। जैसे स्वप्न में प्रमाद से जीव अपने को किसी गृह में बैठे देखता है, वैसे ही यहाँ प्रमाद से आधाराधेयभाव को देखता है, प्राण और मन अहंकार को धारण करता है