योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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और जानता है कि मेरे माता-पिता हैं और मैं अनादि जीव हूँ। अपना शरीर जानकर आगे पाञ्चभौतिक जगत शरीर को देखता है, तब अपने फुरने के अनुसार अंग होते हैं। इसी प्रकार जो आदि शुद्ध चिन्मात्र तत्त्व में स्फुरण हुआ तो चित्तकला उपजी। उसने अपने को तेज-अणु जाना। तब उसमें अहंवृत्ति तो अहंकार हुआ, निश्चयात्मक वृत्ति बुद्धि हुई, चेतनारूप चित्त और संकल्पविकल्परूप मन हुआ। फिर तन्मात्रा उपजी, फिर इच्छा द्वारा उसके शरीर और इन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं। तब देखने की इच्छा हुई। उस संवित् में दृश्य भासित हुआ। तब संवित् शक्ति ने प्रमाददोष से अपने को द्वैतरूप जाना। साथ ही उसके अपने माता, पिता और कुल प्रकटे कि यह मेरी माता है, यह मेरा पिता है और यह मेरा कुल है। यह चिरकाल से चला आता है।
इसी प्रकार अहंकार सहित एक दैत्य विचरने लगा। एक कुटी में एक ऋषि बैठा था, उस कुटी की ओर गया। उसकी कुटी चूर्ण करके जब ऋषि के निकट आया, तब ऋषि ने कहा, रे दुष्ट! तूने यह क्या चेष्टा ग्रहण की है। अब तू मरकर मच्छड़ होगा। हे विपश्चित्! उस ऋषि के शापरूपी अग्नि से उसका शरीर भस्म हो गया और उसकी निराकार चेतनसंवित् भूताकाशरूप हो गई। फिर आकाश में उसका वायु से संयोग हुआ और उस मौनी ऋषि के शाप की वासना आकर उदय हुई। जैसे समय पाकर पृथ्वी में बीज से अंकुर उत्पन्न होता है, वैसे ही पञ्चतन्मात्रा उदय हुई, और अपना मच्छड़ का शरीर, जिसकी आयु दो अथवा तीन दिन की होती है, अज्ञान से भासित हुआ। राम ने पूछा, हे भगवन्! जो जीव जन्म पाते हैं, वे जन्म से जन्मान्तर को चले आते हैं अथवा ब्रह्मा से उपजे होते हैं--यह कहो? वशिष्ठजी बोले, हे राम! कई जन्म से जन्मान्तर को चले आते हैं और कई ब्रह्मा में उपजे होते हैं। जिनको पूर्ववासना का संस्मरण होता है, वे वासना के अनुसार शरीर पाते हैं और जन्म से जन्मान्तर पाते चले आते हैं। और जिनको संस्कार बिना भूत भासित होते हैं, वे ब्रह्मा से उत्पन्न होते हैं। हे राम! आदि में सब जीव संस्काररूपी कारण बिना उत्पन्न