योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1517, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७१३
हुए हैं। पीछे जन्मान्तर होता है। जो संस्कार बिना भूत भासित हो, उसे जानिये कि ब्रह्मा से उपजा है। और जिसको संस्कार से सृष्टि भासित हो; उसे जानिये कि इसका जन्मान्तर है। यह दो प्रकार से भूतों की उत्पत्ति मैंने तुमसे कही है। अब फिर उस मच्छर का क्रम सुनो।
हे राम ! जब उसने मच्छर का जन्म पाया, तब कमलिनियों में और हरी घास, तृण और पत्तों में मच्छड़ों को साथ लिये रहने लगा। निदान वहाँ एक मृग आया और उसका पैर उस मच्छर पर इस प्रकार पड़ा, जैसे किसी पर सुमेरु पर्वत आ पड़े। तब वह मच्छर चूर्ण होकर मृतक हो गया। मृतक होने के समय मृग की ओर देखने लगा, इससे मरकर तत्काल ही मृग हुआ और वन में विचरने लगा। फिर एक काल में उसको वधिक ने देखकर बाण चलाया। उस बाण से वह मृग विंध गया। विंधे हुए घायल मृग ने वधिक की ओर देखा, इसलिए वह मरकर वधिक हुआ और धनुष बाण लेकर मृग और पक्षियों को मारने लगा। एक समय वह वन को गया। वहाँ एक मुनीश्वर को देख उनके निकट जा बैठा। तब मुनीश्वर ने कहा, भाई ! तूने यह क्या पापचेष्टा आरम्भ की है ? इस चेष्टा से तू नरक को जायगा। इससे किसी जीव को दुःख न दे। जिन भोगों के लिए तू यह चेष्टा करता है, वे बिजली की चमक जैसे क्षणिक हैं। जैसे मेघ में बिजली की चमक होती है और फिर मिट जाती है, वैसे ही ये भोग भी होकर मिट जाते हैं। जैसे कमल के पत्ते पर जल की बूँद ठहरती है, पर उसकी आयु कुछ नहीं होती, क्षण भर में वह गिर पड़ती है, वैसे ही इस शरीर की आयु कुछ नहीं है। जैसे अञ्जलि में डाला जल नहीं ठहरता, वैसे ही जवानी चली जाती है। यौवन क्षणभंगुर और असार है। उसमें भोगना क्या है ? इनसे कभी शान्ति नहीं होती। जो तुझको शान्ति की इच्छा हो तो निर्वाण होने का प्रयत्न कर। तब तू दुःख से मुक्त होगा। अपने हिंसाकर्म को त्याग दे। इसके करने से नरक में जायगा और कभी तुझको शान्ति न प्राप्त होगी। तू अपने हाथ से अपने पैर पर क्यों कुल्हाड़ी मारता है, अपने नाश के लिए क्यों विष-बीज बोता