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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1518, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1518

७१४ योगवाशिष्ठ

है? इस कर्म से तू दुःखरूप संसार में भटकता फिरेगा और शान्ति कभी न होगी। इससे अब तू वही उपाय कर, जिससे संसारसमुद्र के पार हो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मङ्गलाव्याधवर्णनन्नाम द्विशताधिकषड्‌विंशतितमसर्गः॥ २२६ ॥

अग्नि बोले, हे राजन्! ऋषीश्वर ने जब इस प्रकार उस वधिक से कहा, तब उसने धनुषबाण डाल दिया और बोला, हे भगवन्! जिस प्रकार में संसारसमुद्र के पार हो जाऊँ, वह उपाय कृपा करके मुझसे कहिये। परन्तु वह उपाय दुःसाध्य न हो और न मृदु हो अर्थात् जो अल्प भी न हो और कठिन भी न हो। ऋषीश्वर बोले, हे वधिक! मन को एकाग्र करने का नाम शम है। इन्द्रियों के रोकने को दम कहते हैं—वही मौन है। मन को एकाग्र करने से अन्तःकरण शुद्ध होता है और अन्तःकरण की शुद्धता से आत्मज्ञान उपजता है। इससे संसारभ्रम निवृत्त होकर परमानन्द की प्राप्ति होती है। अग्नि बोले, हे राजन्! इस प्रकार जब ऋषीश्वर ने कहा, तब वह वधिक उठ खड़ा हुआ और प्रणाम करके तप करने लगा। इन्द्रियों को उसने संयम में रखा और जो अनिच्छित यथाशास्त्र प्राप्त होता उसका भोजन करने लगा। हृदय में सब क्रियाओं की मौनवृत्ति धारण की। जब उसको कुछ काल तप करते व्यतीत हुआ, तब उसका अन्तःकरण शुद्ध हुआ। वह ऋषीश्वर के निकट आ प्रणाम करके बैठ गया और बोला, हे भगवन्! बाहर जो दृश्य है, वह हृदय में किस प्रकार प्रवेश करता है और स्वप्न में अन्तर की सृष्टि बाह्यरूप हो कैसे दिखती है? यह कृपा करके कहो।

ऋषीश्वर बोले, हे वधिक! तूने यह बड़ा गूढ़ प्रश्न किया है। यही प्रश्न मैंने भी गणपति से किया था और उनके कहने से मैंने जो जाना है, सो सुन। एक समय यही सन्देह दूर करने का उपाय मैंने भी किया था। पद्मासन बाँध, बाहर की इन्द्रियों को रोक मन में लगाया और मन, बुद्धि आदि को पुर्यष्टका में स्थित किया। फिर पुर्यष्टका को भी शरीर में विरक्त किया, और उसे आकाश में निराधार ठहराया। निदान