योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1519, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ७१५
जब विलक्षण होना चाहता, तब विलक्षण हो जाता और जब शरीर में व्यापा चाहूँ, तब व्याप जाता । हे वधिक ! इस प्रकार जब मैं योग-धारणा से पूर्ण हुआ, तो एक समय मैंने देखा एक पुरुष मेरी कुटी के पास सो रहा था और उसकी स्वाँस भीतर-बाहर आती-जाती थी । उसको देखकर मैंने यह इच्छा की कि इसके भीतर जाकर कौतुक देखूँ कि क्या अवस्था होती है । ऐसे विचार कर मैंने पद्मासन बाँधा और योग की धारणा करके उसके श्वासमार्ग से भीतर प्रवेश किया । जैसे ऊँट ऊँघता हो और उसके श्वासमार्ग से भीतर सर्प प्रवेश करे, वैसे ही मैंने प्रवेश किया । उसके भीतर अपने-अपने रस को ग्रहण करनेवाली नाड़ियाँ मुझे देख पड़ीं । कई वीर्य को ग्रहण करनेवाली हैं, कई रक्त और कफ को ग्रहण करती हैं, कई मलमूत्रवाली हैं । अनेक विकार जो उसके भीतर थे, सो सब देखे । इससे मैं अप्रसन्न हुआ कि यह तो महा अपवित्र स्थान है । यहाँ रक्तमज्जा से युक्त महानरक के तुल्य अन्धकार है । फिर और आगे गया तो वहाँ एक कमल देखा, जिसमें उसका संवेदन फुरता था और संवित्शक्ति, जो महातेज युक्त हृदयाकाश है, वह भी वहाँ स्थित था । वही त्रिलोकी का आदर्श है, त्रिलोकी में जो पदार्थ हैं, उनका दीपक है और सब पदार्थों की सत्ता है । ऐसी संवित्-रूपी जीवसत्ता वहाँ स्थित थी । उसमें तद्रूपता को प्राप्त हुआ । फिर मैंने सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, पर्वत, समुद्र, देवता, गन्धर्व आदि नाना प्रकार के स्थावर-जङ्गम विश्व को देखा । ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र सहित सम्पूर्ण सृष्टि को उसके भीतर देखकर मुझे आश्चर्य हुआ कि उसके भीतर सृष्टि क्योंकर भासित हुई ।
हे वधिक ! उसने जाग्रत् में उस सृष्टि का अनुभव इन्द्रियों से किया था और भीतर चित्तत्त्व में उसका संस्कार हुआ था । वही भीतर भासने लगा । भीतर जो भूतसत्ता थी, वह उसके स्वप्न में बाहर सृष्टिरूप बनी और मुझको प्रत्यक्ष भासित होने लगी । जैसे जाग्रत् प्रत्यक्ष अर्थाकार भासता है, वैसे ही मुझको यह सृष्टि भासित होने लगी । हे वधिक ! इस जाग्रत् सृष्टि और उस सृष्टि में मैंने कुछ भेद न देखा—दोनों तुल्य