सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1520, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1520

७१६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

है । निरपर्यन्त प्रतीत का नाम जाग्रत् है और अल्पकाल की प्रतीत का नाम स्वप्न है । पर स्वरूप में दोनों तुल्य हैं । जो उसके स्वप्न के अनुभव में था, वह मुझको जाग्रत् दिखा और जो मुझको जाग्रत् दिखा, वह उसको स्वप्न दिखा । निद्रादोष से उसको स्वप्न हुआ, सो उसकी भी उस काल में जाग्रतरूप भासित होने लगा, क्योंकि स्वप्न जो स्वप्नरूप है, सो जाग्रत् में स्वप्न है, और स्वप्न में तो जाग्रत् है । वैसे जाग्रत् भी अपने काल में जाग्रत् है, नहीं तो स्वप्नरूप है । इसलिए जाग्रत् में भी जो सत्य की प्रतीत है; वही प्रमाद है । इन दोनों में कुछ भेद नहीं, क्योंकि जाग्रत् और स्वप्न दोनों का अधिष्ठान चैतन्यसत्ता परब्रह्म ही है और उसी के प्रमाद से प्राण के साथ सम्बन्ध हुआ है । जब प्राण से चित्तसंवेदन मिलता है, तब उस स्फुरण रूप के जीव, मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार आदि नाम होते हैं । वही संवेदन, जो वाह्यरूप हो फुरता है, तब जाग्रतरूप जगत् होकर भासित होता है । और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्म-इन्द्रियाँ और अन्तःकरण चतुष्टय ये चौदह अपने-अपने विषय को ग्रहण करते हैं-उसका नाम जाग्रत है । जब चित्तस्पन्द निद्रादोष में अन्तर्मुख फुरता है, तब नाना प्रकार की स्वप्न की सृष्टि देखता है और उस काल में वही जाग्रतरूप भासित होता है । अधिष्ठान आत्मसत्ता जब संवेदन उसकी ओर फुरती है और बाह्यविषय के स्फुरन से रहित होती है, तब न जाग्रत् भासित होती है और न स्वप्न भासित होता है, केवल निर्विकल्प आत्मसत्ता शेष रहती है ।

हे वधिक ! मैंने विचारकर देखा है कि जगत् और कुछ वस्तु नहीं, फुरने ही का नाम जगत् है । जब चित्तसंवेदन स्फुरणरूप होता है, तब जगत् भासता है और जब चित्तसंवेदन फुरने से रहित होती है, तब जगत् की कल्पना मिट जाती है । इसलिए मैंने निश्चय किया है कि वास्तव में केवल चिन्मात्र है । जगत् कुछ वस्तु नहीं, मिथ्या कल्पनामात्र है । हे वधिक ! जगत्-भावना त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो ।

अब वही वृत्तान्त फिर सुनो । जब उसके भीतर मैंने स्वप्न और