योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1521, कुल 1734 में से
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जाग्रत् अवस्था देखी, तब मैंने यह इच्छा की कि सुषुप्ति अवस्था भी देखूँ। और विचार किया कि सुषुप्ति प्रलय का नाम है, जहाँ द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, तीनों का अभाव हो जाता है। परन्तु जहाँ मैं देखनेवाला हुआ, वहाँ महाप्रलय कैसे होगा और जो मैं जाननेवाला न होऊँ तब सुषुप्ति को कौन जानेगा? हे वधिक! तब मैंने विचारकर देखा कि सुषुप्ति और कुछ नहीं। जहाँ चित्त की वृत्ति नहीं फुरती उसी का नाम सुषुप्ति है। ऐसे विचारकर मैंने चित्त को फुरने से रहित किया, तब उसकी सुषुप्ति देखा तो क्या देखा कि न कोई वहाँ अहं और त्वं शब्द है, न शुभ है, न अशुभ है, न जाग्रत् है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति की कल्पना है। सब कल्पना से रहित केवल चित्तसत्ता मैंने देखी। जो तुम कहो कि तुमने सुषुप्ति निर्विकल्प कैसे देखी तो उसका उत्तर यह है कि अनुभव ज्ञानरूप आत्मसत्ता सर्वदा ज्यों की त्यों है। उसमें जैसा आभास फुरता है वैसा ही ज्ञान होता है। यह जो तुम भी दिन प्रतिदिन देखते हो और सुषुप्ति से उठकर जानते हो कि मैं सुख में सोया था, सो अनुभव से ही देखते हो। वैसे ही मैंने भी वह देखा, जहाँ चित्तसंकल्प कोई नहीं फुरता, केवल निर्विकल्प है, परन्तु सम्यग्बोध से रहित है। उसी अभाव वृत्ति का नाम सुषुप्ति है। फिर मुझको तुरीयावस्था देखने की इच्छा हुई। पर तुरीयावस्था देखना महा-कठिन है।
तुरीयावस्था साक्षीभूत वृत्ति का नाम है। वह सम्यग्ज्ञान से उत्पन्न होती है। वह जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था की साक्षी और सुषुप्ति की नाईं है। जैसे सुषुप्ति में अहं त्वं आदि कोई कल्पना नहीं होती, वैसे ही तुरीयावस्था में भी नहीं। उसमें ब्रह्म का सम्यग्बोध होता है, पर सुषुप्ति जड़ीभूत नामरूप अविद्या होती है। तुरीयावस्था में जड़ता नहीं होती, सुषुप्ति और तुरीयावस्था में इतना ही भेद होता है। सच्चिदानन्दसाक्षी वृत्ति होती है। सम्यग्बोध का नाम तुरीयपद है। तुरीय इससे भिन्न नहीं। ऐसे निश्चय से मैंने इसको देखा। हे वधिक! चारों अवस्था मैंने माया अर्थात् स्फुरण सहित भिन्न-भिन्न देखीं, पर आत्मसत्ता अपने