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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1522, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1522

७२८ ✻ योगवासिष्ठ ✻

आपमें स्थित है। उसमें न कोई जाग्रत है, न स्वप्न है, न सुषुप्ति है और न तुरीयावस्था है—इनका भेद वहाँ नहीं है। आत्मसत्ता सदा अद्वैत है, और ये चारों अवस्थाएँ चित्त संवेदन में होती हैं। हे बंधिक ! ऐसा अनुभव करके में बाहर आया। बाहर भी मुझको वैसे ही दिखने लगा तब मैंने कहा कि यह जगत् मुझको उसके भीतर दिखा था, वह बाहर कैसे आया ? तब मैंने फिर उसके भीतर प्रवेश किया। प्रथम जब उसके भीतर मैंने प्रवेश किया था और उसके भीतर सृष्टि देखी थी, तब उसका और मेरा संवेदन मिल गया था, पर जब मैंने अपना संवेदन उससे भिन्न किया, तब दो ब्रह्माण्ड हो गये। एक उसका संवेदन फुरने में और एक मेरे संवेदन में भासित होने लगा, क्योंकि मैंने प्रथम उसकी सृष्टि को देख और अर्थरूप जानकर ग्रहण किया था। उसका संस्कार दृढ़ हो गया। आत्मसत्ता के आश्रय से जैसे संवेदन फुरता गया वैसे ही होकर भासित होने लगा। उसका स्वप्न मुझको जाग्रत होकर भासित होने लगा—जैसे एक दर्पण में दो प्रतिबिम्ब दिखें, वैसे ही एक अनुभव में मुझको दो सृष्टि दीखने लगीं। तब मैंने विचार किया कि सृष्टि संकल्परूप है। संकल्प प्रत्येक जीव का अपना-अपना है और अपने-अपने संकल्प की भिन्न-भिन्न सृष्टि है, इससे अनुभव के आश्रय से जैसा-जैसा संकल्प फुरता है वैसी-वैसी सृष्टि दिखती है। सृष्टि का कारण और कोई नहीं।

हे बाधिक ! आठ निमेष तक मुझको दो सृष्टि दिखती रहीं। फिर मैंने उसके और अपने चित्त की वृत्ति इकट्ठी करके मिलाई तो दोनों सदृश हो गईं—जैसे जल और दूध मिलकर एकरूप हो जाते हैं। तब दूसरी सृष्टि का अभाव हो गया। जैसे दृष्टि भ्रम से आकाश में दो चन्द्रमा दिखते हैं और भ्रम के न रहने पर दूसरा चन्द्रमा का अभाव हो जाता है, वैसे ही द्वितीय वृत्ति के अभाव में दूसरी सृष्टि का अभाव हो गया। निदान एक ही सृष्टि दिखने लगी, नाना प्रकार के व्यवहार होते दिखे और चन्द्रमा, सूर्य, पृथ्वी, द्वीप, समुद्र स्पष्ट भासित होने लगे। कुछ काल के उपरान्त चित्त की वृत्ति सुषुप्ति की ओर आई