योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1523, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें⁂ निर्वाण प्रकरण ⁂ ७१९
और स्वप्न की सृष्टि का विस्तार लीन होने लगा—जैसे सन्ध्या के समय सूर्य की किरणें सूर्य में लय हो जाती हैं। जब वह सृष्टि चित्त में लय होने लगी, तब स्वप्न की सृष्टि मिट गई; सुषुप्ति अवस्था हुई और सब इन्द्रियाँ स्थिर हो गईं। हे वधिक ! सुषुप्ति तब होती है, जब जीव अन्न भोजन करता है और वह संवाही नाड़ी पर आकर स्थित होता है तब जाग्रत्वाली नाड़ी ठहर जाती है, उसमे प्राण भी ठहर जाते हैं। तब मन भी ठहर जाता है। उसका नाम सुषुप्ति है। जब मन फिर फुरता है, तब जाग्रत्अवस्था होती है। इतना सुन राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जब मन प्राणों ही से चलता है, तब मन का अपना रूप तो नहीं हुआ ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! परमार्थ से कहिये तो देह ही नहीं है, तो मन क्या हो ? जैसे स्वप्न में पहाड़ दिखते हैं, वैसे ही यह शरीर दिखता है, क्योंकि सबका आदिकारण कोई नहीं; इससे जगत् मिथ्याभ्रम है—केवल ब्रह्मसत्ता अपने आप में स्थित है। जो तत्त्ववेत्ता हैं, उनको तो ऐसे ही भासित होता है। अज्ञानी के निश्चय को हम नहीं जानते हैं। जैसे सूर्य उलूक के अनुभव को नहीं जानता और उलूक सूर्य के निश्चय को नहीं जानता, वैसे ही ज्ञानी और अज्ञानी का निश्चय भिन्न-भिन्न होता है। शुद्ध चिन्मात्र आकाश में जगत्-भ्रम कुछ नहीं है, पर स्फुरणभाव से जीव अपने चेतन वपु को भूल, ज्ञान बिना ही मनभाव को प्राप्त होता है और तब मन आत्मसत्ता के आश्रित होकर प्राणवायु को अपना आश्रय कल्पना करता है कि यह मेरा प्राण हे। हे राम ! फिर जैसे-जैसे मन कल्पना करता है, वैसे-वैसे देह, इन्द्रियाँ और जगत् दिखते हैं। परब्रह्म सर्वशक्तिसम्पन्न है। उसमें जैसी-जैसी भावना से मन फुरता है, वैसा ही वैसा रूप भासित होता है। वास्तव में और कुछ नहीं, केवल ब्रह्मसत्ता ही अपने आप में स्थित है। मन का फुरना जैसे-जैसे दृढ़ हुआ है, वैसे ही वैसे देह, इन्द्रियाँ और जगत् भासित होने लगा है। जैसे स्वप्न में कल्पनामात्र जगत् दिखता है, वैसे ही इसे जानो। हे राम ! जितने विकल्प उठते हैं, वे सब मन के रचे हुए हैं। जब मन उदय होता है, तब वह स्फुरण होता