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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1524, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1524

७२० ❇ योगवाशिष्ठ ❇

है कि यह पदार्थ सत्य है और यह असत्य है । जब चित्तशक्ति का मन से सम्बन्ध होता है, तब प्रथम प्राण उदय होते हैं और प्राण का ग्रहण करके मन कहता है कि मैं जीव हूँ; प्राण ही मेरी गति है, प्राण के बिना में कहाँ था ? फिर कहता है कि जब प्राण का वियोग होगा, तब में मर जाऊँगा, फिर न रहूँगा । फिर ऐसे कहता है कि मरकर भी में जिऊँगा । हे राम ! संशयवाले को न इस लोक में सुख है और न परलोक में । जब तक आत्मबोध का साक्षात्कार नहीं होता, तब तक चित्त भी निर्वाण नहीं होता और विकल्प भी नहीं मिटते ।

हे राम ! मन के विस्मरण का उपाय आत्मज्ञान के सिवा कोई नहीं है और मन के शान्त हुए बिना कल्याण भी नहीं होता । दो उपायों से मन शान्त होता है । मन की वृत्ति स्थित करने और प्राण- स्पन्द के रोकने से मन स्थिर होता है, तब प्राण रुक जाते हैं । और प्राण के स्पन्दन को रोकने से भी मन स्थिर होता है । जब प्राण क्षोभ को प्राप्त होते हैं, तब चित्त में भी क्षोभ होता है और तभी जीव अध्या- त्मिक और आधिभौतिक तापों की अग्नि से जलता है । मन को स्थिर करने से परमसुख प्राप्त होता है । इस मन की स्थिति दो प्रकार की है—एक ज्ञान की स्थिति, दूसरी अज्ञान की स्थिति । जब प्राणी बहुत अन्न भोजन करता है, तब वह नाड़ी पर जाकर स्थित होता है और प्राण ठहर जाता है । जब प्राण ठहरता है, तब मन भी जड़ीभूत हो जाता है, उसी का नाम सुषुप्ति है । वे नाड़ी कौन हैं, जिन पर अन्न जाकर स्थित होता है ? वे नाड़ी वे ही हैं, जिनके मार्ग से जाग्रत् में प्राण निकलते हैं । जब वासना के साथ वे ही नाड़ी रोकी जाती हैं, तब मन सुषुप्ति हो जाता है । यह अज्ञानी के मन की स्थिति है, क्योंकि उसमें जड़ता है, अतएव वह संसार के लिये शीघ्र ही फिर उठ आता है । जैसे पृथ्वी में बीज समय पाकर अंकुरित होता है, वैसे ही वह संस्कार-वश फिर सुषुप्ति से उठता है । जो ज्ञानवान् सम्यग्दर्शी है, उसका चित्त चेतनता के लिए स्थिर होता है । वह चेतनता दो प्रकार की है—एक तो योगी की होती है, जिसमें वह समाधि में मन को