योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1525, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❉ निर्वाण प्रकरण ❉
<div align="right">७२१</div>स्थिर करता है वह समाधिनिष्ठ चित्त है; जड़ता नहीं । जैसी सुषुप्ति में जड़ता होती है, वैसी जड़ता वह नहीं है । दूसरे, ज्ञानवान् जीवन्मुक्त के चित्त की वृत्ति सम्यक्ज्ञान से स्थिर होती है, क्योंकि उसका चित्त वासना से रहित है । यही स्थिति है । जिसका चित्त इस प्रकार स्थिर है, उसी पुरुष को शान्ति होती है, और जिसका चित्त वासना सहित है उसको कभी शान्ति नहीं प्राप्त होती । उसके दुःख भी नहीं मिटते । इसका चित्त निर्वासनिक करने को सम्यक्ज्ञान का कारण यह मेरा शास्त्र ही है । इसके समान और कोई उपाय नहीं । हे राम ! यह जो मोक्ष का उपाय शास्त्र मैंने कहा है, उसके विचार से शीघ्र ही स्वरूप की प्राप्ति होगी । इससे सर्वदा इसी का विचार करना चाहिए । जब इसको भली प्रकार विचारोगे, तब चित्त निर्वासनिक हो जायगा ।
अब वही वधिक का प्रसंग सुनो । मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! जब मैंने उस पुरुष के चित्त में प्राणमार्ग से प्रवेश किया, तब देखा, उसके प्राण रोके गये हैं और अन्न से जो जाग्रत् नाड़ी फुरती थी, वह भी रोकी गई है, क्योंकि अन्न पचा न था, इस कारण वह सुषुप्ति में था । उसकी सुषुप्ति में मुझको भी अपना आपा भूल गया । जब कुछ अन्न पचा, तब उसके प्राण जागने लगे और जब प्राण जागने लगे तब चित्त की वृत्ति ने भी कुछ जड़ता को त्यागा । पर सम्पूर्ण जड़ता नहीं गई । प्राण के जगने में चन्द्रमा, सूर्य आदि जो कुछ विश्व है, वह भी जगा । तब मैंने नाना प्रकार के जगत् को देखा और मुझे अपना पूर्वसंस्कार भूल गया । निदान वहाँ मैं भी अपने कुटुम्ब में रहने लगा । साथ ही मुझे अपनी कुटी दिखी और स्त्री, पुत्र, भाई, जन, बान्धव सब दिखे । फिर मेरे देखते-देखते प्रलयकाल के पुष्कर मेघ गर्जने लगे, मूसलधार जल बरसने लगा और सातों समुद्र उमड़ने लगे । निदान जो कुछ प्रलयकाल के उपद्रव होते हैं, वे सब प्रकट हुए । प्रथम अग्नि लगी । जब अग्नि लग चुकी और सब स्थान जल गये, तब जल का उपद्रव प्रकट हुआ । तब मैंने क्या देखा, कि नगर, ग्राम, पुर, मनुष्य, पशु, पक्षी सब बहते जाते हैं । हाहाकार शब्द के साथ बड़ा क्षोभ हुआ । मैंने