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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1526, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1526

७२२ * योगवाशिष्ठ *

और एक आश्चर्य देखा कि मेरी कुटी भी बही जा रही है. मेरे स्त्री, पुत्र, भाई, जन इत्यादि भी सब जल के प्रवाह में बहे जा रहे हैं। जिस स्थान में हम थे, वह स्थान भी बहा जा रहा था और मैं भी लुढ़कता जाता था। निदान बहते-बहते मुझको ऐसा कष्ट हुआ कि कहा नहीं जा सकता। एक तरङ्ग से तो मैं ऊपर को चला जाता और एक तरङ्ग के साथ नीचे चला जाता। तब मुझे अपना पूर्व शरीर याद आ गया। जितना कुछ जगत् है वह मुझको सब दिखने लगा। तब मिथ्या रागद्वेष मिट गया और शरीर की सब चेष्टा उसी प्रकार होने लगी। तरङ्ग के साथ कभी ऊपर और कभी नीचे आता-जाता था। परन्तु मेरा हृदय शान्त हो गया। उस समय नगर, देश और मण्डल बहते जा रहे थे। त्रिनेत्र सदाशिव और विद्याधर, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, सिद्ध आदि सब बहते जा रहे थे। अष्टदल कमल की पंखड़ी पर बैठे ब्रह्माजी और इन्द्र, कुबेर और विष्णु भी अपनी-अपनी पुरियों सहित बहते जा रहे थे। पहाड़, द्वीप, लोकपाल भी बहते जा रहे थे। सब पातालवासी प्रलय के जल में बहते जा रहे थे। यम भी अपने वाहन सहित बहते जा रहे थे। किसी में ऐसी सामर्थ्य न था कि किसी को कोई निकाले, क्योंकि आप ही सब बहते जा रहे थे और डूबते और गोते खाते थे। बड़े ऐश्वर्यवाले देवता भी बहे जा रहे थे। जो संसार-सुख के लिए यत्न करते हैं, वे महामूर्ख हैं। लोग जिसके लिए यत्न करते हैं, वे सुख और दुःख के देनेवाले सब बहते जा रहे थे। वैसे ही सब ऋषीश्वर भी बहते जा रहे थे। हे वधिक! मैंने इस प्रकार एक स्वप्न में महाप्रलय होता देखा।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे हृद्यान्तरस्वप्नमहाप्रलयवर्णनं-नाम द्विशताधिकसप्तविंशतितमः सर्गः ॥ २२७ ॥

वधिक ने पूछा, हे मुनीश्वर! यह महाप्रलय तुमने कहा कि उसमें ब्रह्मादिक भी बहते जा रहे थे। परन्तु ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादिक तो स्वतंत्र ईश्वर हैं, वे परतन्त्र हुए बहते जाते तुमने कैसे देखे? वे अन्तर्धान क्यों न हुए? मुनीश्वर बोले, हे वधिक! यह जो प्रलय हुआ सो क्रम

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