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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1527, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1527

❊ निर्वाण प्रकरण ❊

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से नहीं हुआ। जब क्रम से प्रलय होता है, तब ये ईश्वर समाधि से शरीर को अन्तर्धान कर लेते हैं। परन्तु यहाँ तो अन्तर्धान होने से पहले जल चढ़ गया। इसका कुछ नियम नहीं; क्योंकि यह जगत् भ्रमरूप है। इसमें क्या आस्था करना है। स्वप्न में क्या नहीं बनता और स्वप्नभ्रान्ति से विपर्यय भी होते हैं, इसलिए उनको बहते देखा। व्याध ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जब वह स्वप्न भ्रम था तो उसका वर्णन क्यों किया ? मुनीश्वर बोले, हे वधिक, तुझमें इस समानता का अर्थ कहता हूँ। मैं कह चुका हूँ कि स्थावर जङ्गम जगत् बहता देखा और साथ ही में भी बहता जाता था, जल की लहरें उछलती थीं और उन तरङ्गों में में भी उछलता था, परन्तु मुझको कुछ कष्ट न होता था। निदान में बहता बहता एक किनारे पर जा लगा। उसके पास एक पर्वत था, उसकी कन्दरा में पहुँचा। वहाँ मैंने देखा कि जीव बहते हैं और जल भी सूखता जाता है। जल के सूखने से कीचड़ हो गई। किसी जगह जल रहा, उसमें कोई डूबते दिखते थे। कहीं ब्रह्मा के हंस, कहीं यम के वाहन और कहीं विष्णु के वाहन कीचड़ में पहाड़ की नाईं डूबते देख पड़ते थे। कहीं इन्द्र के हाथी और विद्याधर आदि वाहन कीचड़ में धँसे देख पड़े। देवता, सिद्ध, गन्धर्व, लोकपाल भी देखे। इससे मुझे आश्चर्य हुआ।

हे वधिक ! इस प्रकार देखता हुआ जब मैं पहाड़ की कन्दरा में सो गया, तब मुझको अपनी संवित् में स्वप्न आया। उसमें मैंने चन्द्रमा, सूर्य आदि नाना प्रकार के भूत जलते देखे, नगर और पर्वत जलते देखे और जगत् बड़े खेद को प्राप्त हुआ देखा। जब रात्रि हुई तो वहाँ सोया हुआ स्वप्न को देखता रहा। दूसरे दिन फिर मैंने उसमें जगत् देखा। सूर्य, चन्द्रमा, देश, नदियाँ, समुद्र, मनुष्य, देवता, पशु, पक्षी नाना प्रकार की क्रियाएँ करते देख पड़ने लगे। मैंने अपना सोलह वर्ष का शरीर देखा। मुझे अपने पिता और माता देख पड़े। उनको देख मैंने पिता और माता जाना और उन्होंने मुझको अपना पुत्र जाना। निदान स्त्री, कुटुम्ब, बान्धव समस्त मुझको देख पड़े। मैं बोध में रहित और तृष्णा सहित था, इससे मुझमें अहं-मम का अभिमान