योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1528, कुल 1734 में से
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जगा । मैंने एक ग्राम में, जहाँ मेरा गृह था, ईंट और काष्ठ संग्रह करके एक कुटी बनाई । उसके बाहर बेल बूट लगाकर एक आसन बनाया, जहाँ कमण्डलु और माला पड़ी थीं । मैं ब्राह्मण था, मुझको धन कमाने की इच्छा हुई । और जो कुछ ब्राह्मण का आचार व चेष्टा थी, वह भी मैं करता था । बाहर जाकर ईंट और काष्ठ ले आता और आकर कुटी बनाता था । यह चेष्टा मेरी होने लगी । शिष्य और सेवक मेरी पूजा करने लगे । मैं यथायोग्य उनको आशीर्वाद देता था । इस प्रकार गृहस्थाश्रम में मैं चेष्टा करने लगा । मेरे मन में यह विचार उपजा कि यह कर्तव्य है, इसके करने से भला होता है । नदियों और तालाबों में मैं स्नान करता, गौ की टहल करता और अतिथि की पूजा करता था । हे वधिक ! इस प्रकार चेष्टा करता में सौ वर्ष तक वहाँ रहा । तब एक समय मेरे घर में एक मुनीश्वर आये । मैंने प्रथम उनको स्नान कराया, फिर भोजन से तृप्त किया और रात्रि के समय शय्या पर शयन कराया । इस प्रकार उनकी सेवा कर रात्रि को हम वार्ता-चर्चा करने लगे । उसमें उन्होंने मुझको बड़े पर्वत, कन्दरा और चित्त के मोहनेवाले सुन्दर देश, स्थानों के विषय में नाना प्रकार के संवाद सुनाये । वह कहने लगे कि हे ब्राह्मण ! जितने सुन्दर स्थानों का हाल और समाचार तुमको सुनाये हैं, उन सबमें सार एक चिन्मात्ररूप है । इससे सब चिन्मात्र स्वरूप है । सब जगत् उसका चमत्कार और आभास (किञ्चित्) है । उससे कोई वस्तु भिन्न नहीं । इससे हे ब्राह्मण ! उसी सत्ता को ग्रहण करो, जो सबका अनुभव और परमानन्दस्वरूप है । उसी में स्थित हो जाओ ।
हे वधिक ! उन मुनीश्वर ने जब इस प्रकार मुझसे कहा, तब पहले ही से मेरा मन योग में निर्मल होने के कारण उनके वचन मेरे चित्त में चुभ गये और मैं अपनी स्वभावसत्ता में जाग उठा । तब मैंने देखा कि सब मेरा संकल्प है, मुझसे भिन्न कोई नहीं; मैं तो मुनीश्वर हूँ और यह स्वप्न आया था । मैंने जागकर देखा कि यह उसी पुरुष का स्वप्न था । तब मेरे मन में आया कि किसी प्रकार इसके चित्त से बाहर