योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1529, कुल 1734 में से
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निक्लूँ और अपने शरीर में प्रवेश करूँ। मैंने फिर विचारा कि यह जगत् तो उस पुरुष का शरीर है। वही पुरुष विराट् है, जिसके स्वप्न में यह जगत् है। परन्तु उस पुरुष को अपने विराट्स्वरूप का प्रमाद है. इससे जैसा हमारा शरीर बना है, उसके स्वप्न में वह भी वैसा एक दूसरा विराट् बन पड़ा है। तो फिर उस विराट् का कैसे जानिये कि उसके चित्त से निकला जाय । हे वधिक ! इस प्रकार विचारकर मैंने पद्मासन बाँधा और योग की धारणा कर उसे विराट्स्वरूप के शरीर को देखा । फिर जहाँ चित्त की वृत्ति जगती थी, उसके साथ मिलकर और प्राण के मार्ग से निकलकर मैंने अपनी कुटी की और उसमें अपने शरीर को पद्मासन लगाये देखा । तब मैंने उसमें प्रवेश करके नेत्र खोले तो अपने सामने शिष्य बैठे देखे । वह पुरुष सोया था. उसको भी देखा । एक मुहूर्त बीता, तब मुझे आश्चर्य हुआ कि भ्रम में क्या-क्या चेष्टा देख पड़ती है। यहाँ एक मुहूर्त बीता है और वहाँ मैंने सौ वर्ष का अनुभव किया । बड़ा आश्चर्य है कि भ्रम से क्यों नहीं होता । फिर मेरे मन में आया कि उसके चित्त में प्रवेश करके कुछ और कौतुक भी देखूँ । तब प्राण के मार्ग से उसके चित्त में मैंने फिर प्रवेश किया तो देखा. अगली कल्पना बीत गई; बान्धव, पुत्र, स्त्री, माता, पिता आदि सब नष्ट हो गये हैं और दूसरा कल्पना आ गया है। उसका भी प्रलय होता है बारह सूर्य उदय होकर विश्व जलाने लगे हैं। बड़वाग्नि जलने लगी है। मन्दराचल और अस्ताचल पर्वत जलकर टूक-टूक हो गये हैं। पृथ्वी जर्जर हो गई है। स्थावर-जङ्गम जीव हाहाकार कर रहे हैं। बिजली चमकती है। तब बड़ा क्षोभ हुआ। हे वधिक ! मैं अग्नि में जा पड़ा। मेरा शरीर भी जलने लगा। परन्तु मुझको कुछ कष्ट न हुआ। जैसे किसी पुरुष को अपने स्वप्न में कष्ट प्राप्त हो और जब जाग उठे तो कुछ कष्ट नहीं होता, वैसे ही अग्नि का कष्ट मुझको कुछ न हुआ। मैं अपने को वही जाग्रतवाला रूप जानता था। जगत्-प्रलय को भ्रममात्र जानता था। इस कारण मुझको कष्ट न होता था। चेष्टा तो में भी उसी प्रकार देखता और करता था,