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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1530, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1530

७२६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

परन्तु हृदय से ज्यों का त्यों शान्त चित्त था। और लोग अग्नि के क्षोभ से कष्ट पाते थे।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे हृदयान्तर प्रलयाग्निकदाहवर्णनं नाम द्विशताधिकाष्टविंशतितमसर्गः ॥ २२८ ॥

मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! प्रलय के क्षोभ में मैं भी भटकता था और जल में बहता था, परन्तु पूर्व का शरीर मुझको विस्मरण न हुआ, इस कारण शरीर का दुःख मुझको स्पर्श न करता था। मैंने विचार कि यह जगत् तो मिथ्या है, इसमें विचरने से मेरा क्या प्रयोजन सिद्ध होता है ? यह तो स्वप्नमात्र है। इसमें में किस निमित्त खेद पाऊँ—इसमें जगत् से बाहर निकलूँ। वधिक ने पूछा, हे मुनीश्वर ! तुमने जो उस स्वप्न में जगत् को देखा, वह जगत् क्या वस्तु था और स्वप्न क्या था ? उसकी संविद् में जगत् था और उस जगत् का उसको ज्ञान था वह प्रमादी था ? तुमने तो जाग्रत् होकर उसका स्वप्न देखा था, उसके हृदय में पहाड़ कहाँ से आया और नदियाँ वृक्ष आदि नाना प्रकार के भूत-जाति और पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, अग्नि आदि विश्व की रचना कहाँ से आई ? वह सब क्या था ? यह मेरा संशय दूर करो। जो तुम कहो कि अपने स्वप्न में तुम भी अपनी सृष्टि देखते हो तो हे भगवन् ! हमको जो स्वप्न देख पड़ता है, उसे हम अपने स्वरूप के प्रमाद से देखते हैं। पर तुमने जाग्रत् होकर देखा, तो कैसे देखा ? मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! प्रथम जो मैंने देखा था, वह अपने को भूलकर उसके हृदय में जगत् देखा था। और दूसरी बार जो देखा, वह अपने को जानकर जगत् देखा था। वह क्या वस्तु है सुनो। हे वधिक ! जो वस्तु कारण से होती है, वह सत्य होती है और जो कारण बिना दिखती है, वह मिथ्या होती है। मुझको जो सृष्टि उसके स्वप्न में दिखी थी, वह कारण बिना थी; क्योंकि कारण दो प्रकार का होता है—एक निमित्त कारण; जैसे घट का कारण कुम्हार होता है और दूसरा समवाय कारण; जैसे घट मृत्तिका का होता है। जो दोनों प्रकार से उत्पन्न करे वह कारण कहलाता है। पर आत्मा तो दोनों प्रकार से जगत् का कारण