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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1531, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1531

❈ निर्वाण प्रकरण ❈

७२७

नहीं। वह अद्वैत है, इससे निमित्तकारण नहीं। और समवायकारण भी इसलिए नहीं कि अपने स्वरूप में अन्यथाभाव नहीं हुआ। जैसे मृत्तिका के परिणाम से घट होता है, वैसे ही आत्मा का परिणाम जगत् नहीं है। आत्मा अच्युत है। वह जगत् कारण के बिना भासित हुआ था, इसमें भ्रममात्र ही था।

हे वधिक ! वस्तु वही होती है, तो जगत् की भ्रान्ति आत्मा में भासित हुई, इसलिए जगत् आत्म-रूप हुआ। जब सृष्टि उपजी न थी, तब अद्वैत आत्मसत्ता थी। उसमें संवेदन जगने से जगत् हुए की नाईं उदय हुआ, सो क्या हुआ—जैसे सूर्य की किरणों में जल दिखता है तो वह किरण ही जलरूप प्रतीत होती है, वैसे ही यह जगत् आत्मा का आभास है। आत्मा ही जगद्रूप होकर भासित होता है। वहाँ न कोई शरीर था न कोई हृदय था। न पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश था और न उत्पत्ति और प्रलय था, न और कोई था। केवल चिन्मात्र-रूप ही था। हे वधिक ! ज्ञानदृष्टि से मुझे तो सच्चिदानन्द ही भासित होता है। वह शुद्ध और सब दुःखों से रहित परमानन्द है। जगत् भी वही रूप है। तुम सरीखे को जो जगत् शब्द-अर्थरूप भासित होता है सो आत्मा में कुछ हुआ नहीं, केवल चिन्मात्र सत्ता है। सर्वदा मुझको आत्मरूप ही भासित होता है। जो तू चाहे कि मुझको भी चिन्मात्र ही भासित हो तो ऐसा समझ कि सब कल्पना मन से त्यागने पर उसके पीछे जो शेष रहेगा, वह आत्मसत्ता है, सबका अनुभवरूप वही है। वह प्रत्यक्ष, शुद्ध, सर्वदा स्वभावसत्ता में स्थित और अमर है। तू भी उस स्वभाव में स्थित हो। हे वधिक ! आत्मसत्ता परमसूक्ष्म है; जिसमें आकाश भी स्थूल है। जैसे सूक्ष्म अणु में पर्वत स्थूल होता है, वैसे ही आत्मा में आकाश भी स्थूल है। आत्मा में यहाँ सूक्ष्मता है कि आत्मतत्त्वमात्र है, जिसमें कोई उत्थान नहीं, केवल निर्मल स्वभावसत्ता और निराभास है। उसी में यह जगत् भासित होता है, इससे वही रूप है। जैसे काल में क्षण, पल, घड़ी, पहर, दिन, मास, वर्ष और युगसंज्ञा जो होती है सो काल ही है, वैसे ही एक ही आत्मा