योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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में अनेक नामरूपवाला जगत होता है । जैसे एक बीज में पत्ते, टहनी, फूल, फल, नाम आदि होते हैं, वैसे ही एक आत्मा में अनेक नामरूपवाला जगत् होता है । वह आत्मा से कुछ भिन्न वस्तु नहीं, सब आत्मस्वरूप है । जो आत्मा से भिन्न भासित हो, उसे भ्रममात्र जानो । जैसे संकल्प-पुर होता है वैसे ही यह जगत् है ।
हे वधिक ! आत्मा में जगत् कुछ बना नहीं । वही आत्मा तेरा अपना अनुभवरूप और परमशुद्ध है । उसमें न जन्म है, न मृत्यु । वह चिदाकाश अपना आप है । वही तेरा अपना अनुभवरूप शुद्धसत्ता है—उसको नमस्कार है । हे वधिक ! तू उसमें स्थित हो । तब तेरे दुःख नष्ट हो जावेंगे । यह जगत् अज्ञानी को सत्य लगता है, और ज्ञानवान् को सदा आकाशरूप दिखता है । जैसे एक पुरुष सोया हो और एक जागता हो, तो जो सोया है उसको स्वप्न में महल आदि जगत् दिखता है और जो जागता है, उसको आकाशरूप है, वैसे ही अज्ञानी को जगत् दिखता है और ज्ञानवान् को आत्मरूप है । वधिक बोला, हे मुनीश्वर ! कुछ लोग कहते हैं कि यह जीव कर्म से होता है और कुछ कहते हैं कि कर्म के बिना उत्पन्न होता है । इन दोनों में सत्य क्या है ? मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! आदि में जो परमात्मा से ब्रह्मादिक उपजे हैं, वे कर्म से नहीं हुए । वे कर्म बिना ही उत्पन्न हुए हैं, उन्हें न कहीं जन्म है और न कर्म है । वे ब्रह्मस्वरूप ही हैं । उनका शरीर भी ज्ञानरूप है । वे ओर अवस्था को नहीं प्राप्त होते । उनको सर्वदा अधिष्ठान आत्मा में अहंमतीति है । हे वधिक ! सृष्टि के आदि में जो ब्रह्मादिक उपजे हैं, वे ब्रह्म से भिन्न नहीं । और जो अनन्त जीव उपजे हैं और जिनका आदि में ही आत्म-पद से प्रकट होना हुआ है, वे भी ब्रह्मरूप हैं । ब्रह्म से कुछ भिन्न नहीं । आदि सबका चेतन ब्रह्म स्वयंभू है । परन्तु ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादिक को अविद्या ने स्पर्श नहीं किया । वे विद्यारूप हैं । दूसरे जीव अविद्यावश प्रमाद करके परतन्त्र हुए हैं । वे कर्म करके कर्म के वश हुए हैं और संसार में शरीर धारण करते हैं । जब उनको आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है, तब वे कर्म के बन्धन से मुक्त होकर आत्मपद को पाते हैं ।