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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1533, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1533
  • निर्वाण प्रकरण * ७२६

हे वधिक ! आदि में जो सृष्टि हुई है, वह कर्म के बिना उपजी है । ये जीव पीछे अज्ञान के वश ही कर्म के अनुसार जन्म-मरण देखते हैं । जैसे स्वप्न की सृष्टि आदि में कर्म के बिना उत्पन्न होती है और पीछे कर्म से उत्पन्न होती भासित होती है; वैसे ही यह जगत् है । आदि में जीव कर्म के बिना उपजे हैं और पीछे कर्म के अनुसार जन्म पाते हैं । ब्रह्मादिक के शरीर शुद्ध ज्ञानरूप हैं । ईश्वर में जीवभाव दिखता है, पर उस काल में भी वह ब्रह्मस्वरूप ही है, क्योंकि उन ईश्वर के कर्म कोई नहीं, केवल आत्मा ही उनको दिखता है, आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । जैसे स्वप्न में द्रष्टा ही दृश्यरूप होता है और नाना प्रकार के कर्म दिखते हैं, परन्तु और कुछ हुआ नहीं, वैसे ही जो कुछ जगत् दिखता है, सो सब चिन्मात्रस्वरूप है, और कुछ नहीं सुख-दुःख भी वही भासित होता है, परन्तु अज्ञानी को जब तक जगत् की प्रतीति होती है, तब तक वह कर्मरूपी फाँसी से बँधा हुआ दुःख पाता है । जब स्वरूप में स्थित होगा, तब कर्म के बन्धन से मुक्त होगा । किन्तु वास्तव में न कोई कर्म है, और न किसी को बन्धन है । यह मिथ्या भ्रम है । केवल आत्मसत्ता अपने आप में स्थित है । दूसरा कुछ हो तो मैं कहूँ कि इस कर्म ने इसको बन्धन किया है । यह जगत् आत्मा में ऐसा है, जैसे जल में तरङ्ग होता है, सो भिन्न कुछ नहीं । जल से तरङ्ग उत्पन्न होता है, सो किस कर्म से होता है और क्या उसका रूप है ? जैसे वह जल रूप ही है, वैसे ही यह जगत् भी आत्मस्वरूप है—आत्मा से इतर कुछ नहीं । जो कुछ कल्पना कीजिये, वह अविद्यामात्र है ।

हे वधिक ! जब तक यह संवित् बहिर्मुख जगती है, तब तक जगत् भासित होता है और कर्म होते दिखते हैं । जब संवित् अन्तर्मुख होगी, तब न कोई जगत् रहेगा और न कोई कर्म देख पड़ेगा । तब सब आत्मसत्ता ही भासित होगी । जैसे मुझको सदा आत्मसत्ता भासित होती है, वैसे ही तुमको भी भासित होगी । हे वधिक ! जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, उनको जगत् आत्मतत्त्व दिखाई देता है, और जो अज्ञानी हैं, उनको प्रमाद से द्वैतरूप भासित होता है । इससे वह पदार्थों को सुख-

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 1533, कुल 1734 में से · BharatKosha