योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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रूप जानकर पाने का यत्न करता है। सुख से सुखी और दुःख से द्वेष करता है। पर परमानन्द जो आत्मपद है, उसके पाने का यत्न नहीं करता। ज्ञानवान् सदा परमानन्द में स्थित है। उसको सब जगत् ब्रह्म-स्वरूप दिखता है। हे वधिक! सब जगत् जो तुझको दिखता है, वह चिन्मात्रस्वरूप ब्रह्म है। न कोई स्वप्न है, न कोई जाग्रत् है, न कोई कर्म है और न कोई अविद्या है। सब ब्रह्मस्वरूप सदा अपने आप में स्थित है। उसमें और कुछ नहीं। जैसे जल में आवर्त्त होता है, परन्तु जल से भिन्न कुछ नहीं होता, वैसे ही ब्रह्म में जगत् हुए की नाईं भासित होता है, परन्तु ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं है। तू विचार करके सब जगत् ब्रह्मस्वरूप देख। तब तेरे दुःख मिट जावेंगे। जब तक विचार करके स्वरूप न पावेगा, तबतक दुःख न मिटेगा। जब स्वरूप को पावेगा, तब सब कर्म नष्ट हो जावेंगे। जितना विचार होता है, उतना ही सुख मिलता है। जहाँ विचार उत्पन्न होता है, वहाँ से अविद्या नष्ट हो जाती है। जैसे जहाँ प्रकाश होता है, वहाँ अन्धकार नहीं रहता, वैसे ही जहाँ सत्य असत्य का विचार उत्पन्न होता है, वहाँ अविद्या का अभाव हो जाता है। वह फिर संसारचक्र में नहीं फँसता, बल्कि परमपद को प्राप्त होता है। जिस ज्ञानवान् को यह पद प्राप्त हुआ, वह दुःखी नहीं होता।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे कर्मनिर्णयो नाम द्विशताधिकैकोनत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ २२६ ॥
मुनीश्वर बोले, हे वधिक! जो ज्ञानवान् पुरुष है, वह अवश्य उस परमानन्द को प्राप्त होता है, जिसके पाने से इन्द्रियों का आनन्द सूखे तृण सा तुच्छ प्रतीत होता है। वैसा सुख पृथ्वी, आकाश और पाताल में भी कहीं नहीं मिलता, जैसा सुख ज्ञानवान् को प्राप्त होता है। जिसको ऐसा आनन्द प्राप्त हुआ है, वह किसकी इच्छा करे? आत्मानन्द तब प्राप्त होता है, जब आत्मज्ञान का अभ्यास होता है। आत्मा शुद्ध और सर्वदा अपने आपमें स्थित है। जो कुछ आगे देख पड़ता है, वह अविद्या का विलास है। जब तू अपने स्वरूप में स्थित होगा, तब तुझको सब ब्रह्म ही भासित होगा। हे वधिक! पृथ्वी आदि तत्त्व जो देख पड़ते हैं, वे