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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1535, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1535

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७३१

वास्तव में हैं नहीं। ये जो कुछ होते तो इनका कारण भी कोई होता, पर जब ये ही नहीं हैं, तब इनका कारण किसको कहिये। और जो इनका कारण नहीं तो कार्य किसका कहिये। इसलिए ये भ्रममात्र हैं। विचार करने से जगत् का अभाव हो जाता है और आत्मसत्ता ही ज्यों की त्यों प्रतीत होती है। जैसे किसी को रस्सी में सर्प दिखता है, पर जब वह भली प्रकार देखता है, तब सर्प का भ्रम मिट जाता है और ज्यों की त्यों रस्सी ही दिखती है, वैसे ही विचार किये से आत्मसत्ता ही भासित होती है। जैसे आकाश में संकल्प का कल्पवृक्ष अथवा देवता की प्रतिमा रचकर उससे प्रार्थना करो तो अनुभव से कार्य सिद्ध होता है, वैसे ही जितना जगत् तू देखता है सो सब संकल्पमात्र और अनुभवरूप है। जैसे स्वप्न में नाना प्रकार की सृष्टि स्वप्नमात्र है, वैसे ही यह सब विश्व ब्रह्मा के संकल्प में स्थित है। आदि में परमात्मा से कर्म के बिना जो सृष्टि उपजी है, वह किञ्चन आभासरूप है। फिर आगे जो ब्रह्मा ने रचा है, वह संकल्परूप है, फिर आगे जीव अज्ञान से कर्म करने लगे। तब उन कर्मों से उत्पत्ति होती देख पड़ी है। जैसे स्वप्न में स्वप्न की सृष्टि भ्रममात्र होने पर भी दृढ़ भासती है—जब तक स्वप्न की अवस्था है, तब तक जैसा वहाँ कर्म करेगा, वैसा ही भासित होगा और जब जाग उठे तो न कहीं कर्म है, न जगत् है—वैसे ही यह सब संकल्पमात्र है। ज्ञान से इसका अभाव हो जाता है।

हे वधिक ! ये जो मनुष्य तुझको दिखते हैं, वे जब मनुष्य ही नहीं तो उनके कर्म मैं तुझसे कहूँ ? जैसे स्वप्न के निवृत्त होने पर स्वप्न की सृष्टि का अभाव हो जाता है, वैसे ही अविद्या के निवृत्त होने पर अविद्या की सृष्टि का भी अभाव हो जाता है। आत्मसत्ता अद्वैत है। उसमें जगत् कुछ बना नहीं—वही रूप है। जैसे आकाश और शून्यता, अथवा वायु और स्पन्दन में भेद नहीं होता, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में भेद नहीं। जब चित्तसंवित् जगती है, तब जगत् होकर भासित होती है, और जब नहीं जगती, तब अद्वैत होकर स्थित होती है। पर आत्मसत्ता जगने और न जगने में ज्यों की त्यों है।