योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1536, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें७३२ * भागवतशास्त्र *
जन्म-मरण और बढ़ना-घटना मिथ्या है; क्योंकि दूसरी वस्तु कुछ नहीं। जैसे किसी ने जल और किसी ने पानी कहा तो दोनों एक ही वस्तु के नाम हैं, वैसे ही आत्मा और जगत् एक ही के नाम हैं, परन्तु अज्ञान से भिन्न-भिन्न लगते हैं। जैसे स्वप्न में कार्य दिखते हैं, परन्तु होते नहीं, ऐसे ही जाग्रत् में कारण-कार्य दिखते हैं, परन्तु हैं नहीं—वास्तव में आत्मतत्त्व ही है। उस आत्मा में जो अहं-मम रूप चित्त फुरता है और उस उत्थान में आगे जो कुछ स्फुरण होता है, वही जगत् है। उस जगत् में जैसा-जैसा निश्चय होता है, वैसा ही वैसा भासित होने लगता है—इसका नाम नेति है। उसमें देश, काल और पदार्थ की संज्ञा होने लगती है। और कारण-कार्य जो देख पड़ते हैं सो क्या हैं? केवल आत्मसत्ता अपने आप में स्थित है। कुछ हुआ नहीं, परन्तु हुए की नाईं दिखता है। जैसे स्वप्न में नाना प्रकार का जगत् दिखता है और कारण-कार्य भी दृष्टि देख पड़ता है, परन्तु जागने पर कुछ दृष्टि-गत नहीं होता, क्योंकि है ही नहीं, वैसे ही यह जगत् कारण-कार्यरूप दिखता है, परन्तु है नहीं। आत्मा से दिखता है, इसलिए आत्मा ही है। जैसे सङ्कल्प नगर दिखता है, वैसे ही आत्मा में घन चैतन्य में जगत् दिखता है, सो वही रूप है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। जैसा आत्मा में निश्चय होता है, वैसा ही प्रत्यक्ष अनुभव होता है। यह सब जगत् सङ्कल्पमात्र है; सङ्कल्प ही जहाँ तहाँ उड़ते फिरते हैं। अनुभवसत्ता ज्यों की त्यों है—सङ्कल्प से ही प्राणी सरकर परलोक देखता है।
बधिक बोला, हे भगवन्! परलोक में जो यह मर कर जाता है तो उस शरीर का कारण कौन होता है और वह मरता और मारता कौन है? यह शरीर तो यहीं रहता है, वहाँ साक्षा शरीर कौन होता है, जिसमें जीव सुख-दुःख भोगता है? जो तुम कहो कि उस शरीर का कारण धर्म-अधर्म होता है तो धर्म-अधर्म तो अमूर्ति है, उससे समूर्ति और साकाररूप क्या उत्पन्न हुआ? मुनीश्वर बोले, हे बधिक! शुद्ध अधिष्ठान जो आत्मसत्ता है, उसके फुरने की अनेक संज्ञा होती हैं—कर्म, आत्मा, जीव फुरना, धर्म-अधर्म आदि नाना प्रकार के उसके नाम हैं। जब शुद्ध चिन्मात्र