योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1537, कुल 1734 में से
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में अहं का उत्थान होता है, तब देह की भावना होती है और देह ही भासित होने लगती है। आगे जगत् भासित होता है और स्वरूप के प्रमाद से संकल्परूप जगत् दृढ़ हो जाता है। फिर उसमें जैसा-जैसा फुरता है, वैसा-वैसा ही भासित होता है। हे बधिक! यह जगत् संकल्प-मात्र है, परन्तु स्वरूप के प्रमाद से सत्य दिखता है। प्रमाद से शरीर में अभिमान हो गया है, उससे जीव अपने को कर्त्ता और भोक्ता मानता है। वासना दृढ़ हो जाने से उसके अनुसार परलोक देखता है। हे बधिक! वहाँ न कोई परलोक है और न यह लोक है। जैसे मनुष्य एक स्वप्न को छोड़कर दूसरे स्वप्न को देखे, वैसे ही जीव अवादित वासना से इस लोक को त्यागकर परलोक को देखता है। जैसे स्वप्न में निराकार ही साकार शरीर उत्पन्न होता है, वैसे ही परलोक है। पर वास्तव में संकल्प ही पिण्डाकार होकर भासित होता है। जैसी वासना होती है, वैसा ही उसके अनुसार होकर दिखता है। वास्तव में शरीर और पदार्थ सभी आकाशरूप हैं। हे बधिक! असत्य जन्म-मरण सत्य होकर भासित होता है। जैसा-जैसा फुरना होता है, वैसा ही वैसा भासित होता है—जगत् आभासमात्र है।
जो ज्ञानवान् पुरुष हैं उनको आत्मभाव ही सत्य है। उनमें जैसा निश्चय होता है, वैसा भान होता है। ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञानारूप जगत् जो भासित होता है, वह अनुभव से भिन्न नहीं। जैसे स्वप्न में जो अनेक पदार्थ दिखते हैं, सो अनुभव ही अनेक रूप होकर भासित होता है और प्रलय में सब एक हो जाते हैं, वैसे ही ज्ञानरूपी प्रलय में सब एकरूप हो जाते हैं। जब संवित् जगती है, तब नाना प्रकार का जगत् दिखता है। और जब संवित् लय होती है, तब प्रलय हो जाता है और सब एकरूप हो जाता है। एक चिन्मात्र सत्ता अपने आपमें स्थित है। पृथ्वी आदि पदार्थ उसका चमत्कार है, भिन्न वस्तु कुछ नहीं। आत्म-सत्ता निर्विकार है। उसमें निराकार और साकार भी कल्पित है। जो पुरुष दृश्य से मिले चेतन हैं, वे जड़धर्मी हैं। उनको नाना प्रकार के पदार्थ भासित होते हैं। ज्ञानवान् को सत्यरूप चिन्मात्र ही भासित