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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

☀ निर्वाण प्रकरण ☀

७३३

में अहं का उत्थान होता है, तब देह की भावना होती है और देह ही भासित होने लगती है। आगे जगत् भासित होता है और स्वरूप के प्रमाद से संकल्परूप जगत् दृढ़ हो जाता है। फिर उसमें जैसा-जैसा फुरता है, वैसा-वैसा ही भासित होता है। हे बधिक! यह जगत् संकल्प-मात्र है, परन्तु स्वरूप के प्रमाद से सत्य दिखता है। प्रमाद से शरीर में अभिमान हो गया है, उससे जीव अपने को कर्त्ता और भोक्ता मानता है। वासना दृढ़ हो जाने से उसके अनुसार परलोक देखता है। हे बधिक! वहाँ न कोई परलोक है और न यह लोक है। जैसे मनुष्य एक स्वप्न को छोड़कर दूसरे स्वप्न को देखे, वैसे ही जीव अवादित वासना से इस लोक को त्यागकर परलोक को देखता है। जैसे स्वप्न में निराकार ही साकार शरीर उत्पन्न होता है, वैसे ही परलोक है। पर वास्तव में संकल्प ही पिण्डाकार होकर भासित होता है। जैसी वासना होती है, वैसा ही उसके अनुसार होकर दिखता है। वास्तव में शरीर और पदार्थ सभी आकाशरूप हैं। हे बधिक! असत्य जन्म-मरण सत्य होकर भासित होता है। जैसा-जैसा फुरना होता है, वैसा ही वैसा भासित होता है—जगत् आभासमात्र है।

जो ज्ञानवान् पुरुष हैं उनको आत्मभाव ही सत्य है। उनमें जैसा निश्चय होता है, वैसा भान होता है। ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञानारूप जगत् जो भासित होता है, वह अनुभव से भिन्न नहीं। जैसे स्वप्न में जो अनेक पदार्थ दिखते हैं, सो अनुभव ही अनेक रूप होकर भासित होता है और प्रलय में सब एक हो जाते हैं, वैसे ही ज्ञानरूपी प्रलय में सब एकरूप हो जाते हैं। जब संवित् जगती है, तब नाना प्रकार का जगत् दिखता है। और जब संवित् लय होती है, तब प्रलय हो जाता है और सब एकरूप हो जाता है। एक चिन्मात्र सत्ता अपने आपमें स्थित है। पृथ्वी आदि पदार्थ उसका चमत्कार है, भिन्न वस्तु कुछ नहीं। आत्म-सत्ता निर्विकार है। उसमें निराकार और साकार भी कल्पित है। जो पुरुष दृश्य से मिले चेतन हैं, वे जड़धर्मी हैं। उनको नाना प्रकार के पदार्थ भासित होते हैं। ज्ञानवान् को सत्यरूप चिन्मात्र ही भासित

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होता है । हे वधिक ! यह सब जगत् चिन्मात्र है । जब चित्त संवित् फुरती है, तब स्वप्नरूप जगत् दिखता है और जब चित्तसंवित् स्फुरण से रहित होती है, तब सुषुप्ति होती है । ऐसे ही चित्त संवित् के जगने से सृष्टि होती है और चित्त के स्थिर होने में प्रलय हो जाता है । जैसे स्वप्न और सुषुप्ति आत्मा में कल्पित हैं, वैसे ही आत्मा में कल्पित सृष्टि और प्रलय आभासमात्र है । जगत् कुछ बना नहीं । जगने से जगत् भासित होता है, इससे जगत् भी आत्मरूप है । पञ्चतत्त्व भी आत्मा का नाम है । सदा अद्वैतरूप जगत् आभासमात्र है । जैसे आत्मा में साकार कल्पित है, वैसे ही निराकार भी कल्पित है । जैसे जीव स्वप्न में किसी को साकार और किसी को निराकार जानता है, पर दोनों स्फुरणमात्र हैं । जो फुरने से रहित है, वह आत्मसत्ता है । साकार और निराकार भी वही है । आत्मसत्ता ही इस प्रकार होकर भासित होती है और निराकार ही साकार होकर भासित होता है ।

हे वधिक ! सब जगत् जो तुझको दिखता है, वह चिन्मात्रस्वरूप है, भिन्न कुछ नहीं । परन्तु अज्ञान से नाना प्रकार के कार्य-कारण और जन्म-मरण आदि विकार दिखते हैं । वास्तव में न कोई जन्म है और न मरण । न कोई कार्य है और न कारण । यदि जीव मरता होता तो परलोक भी न देखता और अपने मरने को भी न जानता । जो मरकर परलोक देखता है, वह मरता नहीं । यदि मनुष्य मृतक हो तो पूर्व के संस्कार को न पावे और पूर्वस्मृति उसको न हो । पर तू तो पूर्वसंस्कार से क्रिया में प्रवृत्त होता है । प्रतियोग से तुझे पदार्थों की स्मृति भी हो आती है । फिर कर्मफल भोगता है । लोक में तो पुरुष मृतक नहीं होता, केवल भ्रम से मरण दिखता है और कारण-कार्यरूप पदार्थ दिखते हैं । जब मरकर परलोक देखता है, सुख-दुख भोगता है तो वह शरीर किसी कारण से नहीं बना । जैसे वह शरीर अकारण है, वैसे ही और जो आकार दिखते हैं, वे भी अकारण हैं-इसी से आभासमात्र हैं। जैसे स्वप्न के शरीर से जो नाना प्रकार की क्रियाएँ होती हैं और मनुष्य देश-देशान्तर देखता है, सो सब मिथ्या हैं; वैसे ही यह जगत् मिथ्या है

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ७३५

और मरण भी मिथ्या है जो तू कहे कि जब इसके आकार का अभाव देखता है तब जानता है कि वह मर गया तो हे बधिक ! जब यह पुरुष परदेश जाता है तब भी इसका आकार नहीं दिखाई पड़ता । जैसे दृष्टि के अभाव में असत्य होता है, वैसे ही देह के त्याग में भी इसका असत्यभाव होता है । पर इस पुरुष का अभाव कभी नहीं होता । जो तू कहे कि परदेश गया फिर आ मिलता है, पर शरीर के त्यागने पर फिर नहीं मिलता तो परदेश गया फिर मिलकर बातचीत करता है और मृतक तो कभी चर्चा नहीं करता, तो जिसके पितर प्रीति में बँधे हुए मरते हैं और जिनकी यथाशास्त्र क्रिया नहीं होती, वे स्वप्न में आ मिलते हैं और बताते हैं कि हमारी क्रिया तुमने नहीं की; हम अमुक स्थान में पड़े हैं या अमुक द्रव्य अमुक स्थान में गड़ा है; तुम निकाल लो । जैसे पर-देसी लौटकर मिलते हैं और वार्ता-चर्चा करते हैं, वैसे ही मृतक भी करते हैं, यह सिद्ध है । हे बधिक ! वास्तव में न कोई जगत् है और न कोई मरता है, केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है और जैसा-जैसा उसमें स्फुरण फुरता है, वैसा ही भासित होता है ।

हे बधिक ! अनुभव एक कल्पवृक्ष है, जैसा-जैसा उसमें फुरता है, वैसा ही वैसा भासित होता है । एक संकल्पसिद्ध और एक दृष्टिसिद्ध वस्तु है । जब इनकी दृढ़ भावना होती है, तब ये दोनों सिद्ध होती हैं । जो इन्द्रियों में दृश्य पदार्थ हैं, वे दृष्टिसिद्ध वस्तु कहाते हैं । जो इनकी भावना होती है तो यही प्राप्त होते हैं । और जो अपने मन में आपही मान लीजिये कि मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र (वर्ण) हूँ, अथवा गृहस्थ, वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी या संन्यासी (आश्रम) हूँ तो यह संकल्प सिद्ध है । जब तक इनका अध्यास होता है, तब तक आत्मसत्ता की प्राप्ति नहीं होती और जब आत्मसत्ता का अध्यास होता है, तब इन दोनों का अभाव हो जाता है और आत्मा ही प्रत्यक्ष अनुभव से दिखता है । हे बधिक ! जिस वस्तु का अभ्यास होता है, उसकी यदि भावना करे और थककर उसे छोड़े नहीं तो वह अवश्य प्राप्त होती है । पर अभ्यास अथवा अभ्यास के बिना कुछ नहीं सिद्ध होता । जैसे कोई

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पुरुष कहे कि मैं अमुक देश जाता हूँ तो जब तक उसकी ओर वह चले नहीं, तब तक अनेक उपाय को करने से भी वह देश नहीं प्राप्त होता और जब उसकी ओर चलेगा तब पहुँच जायगा, वैसे ही जब बहुत एकाग्र होकर आत्मा का अभ्यास करेगा तब उसको आत्मा प्राप्त होगा, अन्यथा आत्मपद को वह न पहुँचेगा। हे वधिक! जिस पुरुष को जगत् के पदार्थों की इच्छा हो, उसको आत्मपद नहीं प्राप्त होता। जिसको आत्मपद की इच्छा है, उसको वही प्राप्त होगा, जगत् के पदार्थ न भासित होंगे। यदि ऐसी भावना हो कि मेरी देवता की सी मूर्ति हो और उससे मैं स्वर्ग में विचरूँ और एक रूप से भूलोक में मृग होकर भ्रमण करूँ तो दृढ़ अभ्यास से वही हो जाता है; क्योंकि जगत् संकल्प-मात्र है। जैसा-जैसा निश्चय होता है, वैसा ही भासित होता है। हे वधिक! दो रूप की क्या बात है, जो सहस्रमूर्ति की भावना करे तो वही तद्रूप हो जायगा। यह मनुष्य जैसी भावना करता है, वैसा ही हो जाता है। यह अविद्याकृत जगत् भ्रममात्र है इसकी भावना त्यागकर आत्मपद का अभ्यास कर, तब तेरे दुःख जावेंगे।

इति श्रीयोगवाशिष्ठेनिर्वाणप्रकरणे महाशवोपाख्याने निर्णयोपदेशो नाम द्विशताधिकत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ २३० ॥

मुनीश्वर बोले, हे वधिक! जैसे अगाध समुद्र में अनेक तरङ्ग उठते हैं, वैसे ही आत्मा में अनेक सृष्टियाँ फुरती हैं। जीव जीव की अपनी अपनी सृष्टि है, परन्तु परस्पर एक दूसरे को अज्ञात है, एक की सृष्टि को दूसरा नहीं जानता। जैसे एक ही स्थान में दो पुरुष सोये हों तो उनकी अपने-अपने स्वप्न की सृष्टि दिखती है, पर एक की सृष्टि को दूसरा नहीं जानता, परस्पर दोनों अज्ञात होते हैं, वैसे ही सब सृष्टि आत्मा में फुरती है; परन्तु एक की सृष्टि को दूसरा जीव नहीं जानता। जो धारणाभ्यासी योगी है, उसको आन्तर्वाहक शरीर प्रत्यक्ष होता है, और वह दूसरे की सृष्टि को भी जानता है। जैसे एक तालाब का मेढक होता है, एक कूप का मेढक होता है और एक समुद्र का मेढक होता है। सो इनके स्थान तो भिन्न-भिन्न होते हैं, परन्तु जल एक ही है।

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

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इससे चाहे जैसा मेढक हो, पर उसको जल जानता है कि मुझमें है, वैसे जगत् भिन्न-भिन्न अन्तःकरणों में है, परन्तु आत्मसत्ता के आश्रित है। आदि जो संवेदन उसमें जगा है, वह अन्नवाहक है। जब अन्त-वाहक में योगी स्थित होता है, तब और के अन्तवाहक को भी जानता है। इस प्रकार आत्मा के आश्रय में अन्तवाहक में अनन्त सृष्टि फुरती है। वे आत्मा का किञ्चन हैं, फुरती भी हैं और मिट भी जाती हैं। संवेदन के जगने से सृष्टि उत्पन्न होती है और संवेदन के ठहरने में मिट जाती है, क्योंकि वह आकाशरूप होती है। जैसे वायु के ठहरने में जल एक रूप हो जाता है और जल के सिवा कुछ नहीं दिखती, वैसे ही संवेदन के फुरने में आत्मा में अनन्त सृष्टि भासित होती है, और संवेदन के ठहरने में सब आत्मरूप हो जाती है। तब आत्मा के सिवा कुछ नहीं भासित होता, क्योंकि उससे इतर प्रमाद से दिखता है और फिर कारण-कार्य भ्रम भासित होता है। प्रथम जो सृष्टि उपजी है, वह कारण-कार्य के क्रम और संस्कार से रहित है। पीछे कारण-कार्य क्रम भासित हुआ। फिर उसका संस्कार हृदय में हुआ। तब संस्कारवश वे भासित होने लगी। जिनको स्वरूप का प्रमाद नहीं हुआ, उनको सदा परब्रह्म का निश्चय रहता है और जगत् अपना संकल्पमात्र भासित होता है। और जिनको स्वरूप का प्रमाद होता है, उनको संस्कारपूर्वक जगत् भासित होता है। पर संस्कार भी कुछ वस्तु नहीं।

हे वधिक ! जब जगत् ही मिथ्या है, तब उसका संस्कार कैसे सत्य हो ? परन्तु ज्ञानवान् को इस प्रकार दिखता है और अज्ञानी को स्पष्ट दिखता है। हे वधिक ! जैसे तुम संकल्प के रचे पदार्थ—स्मृति और स्वप्नसृष्टि को असत् जानते हो, वैसे ही मैं इस जाग्रतसृष्टि को असत् जानता हूँ। जैसे मृगतृष्णा का जल असत् दिखता है, वैसे ही मुझको यह जगत् असत्य है। तो फिर कारण, कार्य, कर्म-संस्कार मुझको कैसे भासित हों ? अज्ञानी को तीनों दिखते हैं। हे वधिक ! जब चित्त-संवित् बहिर्मुख होती है, तब जगत् दिखता है और जब अन्तर्मुख होती है, तब अपने स्वरूप को देखती है। जब आत्मतत्त्व का किञ्चन

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संवेदन फुरता है, तब स्वप्न जगत् होकर भासता है; और जब ठहर जाता है, तब सुषुप्ति-प्रलय हो जाता है। फुरने का नाम सृष्टि की उत्पत्ति और ठहरने का नाम प्रलय है। जिसके आश्रय से सृष्टि का स्फुरण होता है वह शुद्धसत्ता अव्यक्त और निराकार है—वहाँ आकार होकर भासता है। और जो अकारण निराकार है, उसमें अकारण आकार भासित होता है, इससे जानना है, कि वही रूप है और कुछ नहीं। आकार भी निराकार है; दृष्टि ही सृष्टिरूप होकर दिखती है। यह जगत् आभासमात्र है। जैसे समुद्र का आभास तरङ्ग होते हैं, वैसे ही आत्मा का आभास यह जगत् है। आत्मानन्द, चिदाकाश और सब जगत् का अपना रूप है। वधिक बोला, हे मुनीश्वर ! तुम जगत् को अकारण कहते हो तो कारण के बिना यह कैसे उत्पन्न होता है, क्योंकि प्रत्यक्ष दिखता है। और जो कारण से उत्पत्ति कहो तो इसे स्वप्न सा क्यों कहते हो ? स्वप्नसृष्टि तो कारण बिना होती है। इसमें यह कहो कि यह सृष्टि कारणसहित है अथवा कारण से रहित अकारण है।

मुनीश्वर बोले, हे वधिक ? यह जगत् आदि में अकारण और आत्मा का आभासमात्र है। आत्मा में इसका अत्यन्ताभाव है। और कुछ पदार्थ बने नहीं। आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है। इसलिए चिदाकाश चिन्मात्र है और उसका किञ्चन चेतनता है। जैसे सूर्य की किरणों का आभास जल दिखता है, परन्तु मिथ्या है, वैसे ही आत्मा का किञ्चन चेतन है। वह किञ्चन संवेदन अहंभाव को लेकर जगता गया है और जैसे-जैसे जगता है वैसा ही वैसा जगत् होकर भासित होता है। जो-जो उसमें निश्चय किया है कि यह कर्तव्य है, इसके करने से पाप है, यह करना है, यह नहीं करना है और देश, काल, क्रिया, क्रम है, सो यह इसी प्रकार है। यह ऋषि है, यह देवता है, यह मनुष्य है, यह द्वैत है, यह धर्म है, यह कर्म है। इससे इनका बन्धन है; इससे इनका मोक्ष है। हे वधिक ! जो आदि नीति रची है, वह वैसी ही अब तक स्थित है, अन्यथा नहीं होती—इसी में कारण-कार्य क्रम है। प्रथम जो सृष्टि उपजी है, वह बुद्धिपूर्वक नहीं बनी—आकाशमात्र

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ७३६

उपजी है और जैसे उपजी है वैसे ही स्थित है फिर पदार्थ जो एक भाव को त्यागकर और भाव को अङ्गीकार करते हैं, सो कारण से करते हैं ? कारण बिना नहीं होते । क्योंकि प्रथम सृष्टि अकारण हुई है और पीछे से सृष्टिकाल में कारण-कार्य हुए हैं । परन्तु हे वधिक ! जिन पुरुषों को आत्मा का साक्षात्कार हुआ है, उनको यह जगत् कारण के बिना ब्रह्मस्वरूप भासित होता है और जिनको आत्मसत्ता का प्रमाद है, उनको कार्य-कारण सत्य भासित होता है । परन्तु आत्मा ब्रह्म निराकार अकारण है उसमें संवेदन के फुरने से अब्रह्मता भासित होती है; निराकार में आकार भासित होता है और अकारण में कारण भासित होता है । जब संवेदन, जो मन का जगना है, वह स्थिर हो जाता है, तब सब जगत् कारण-कार्य सहित दिखता है । पर प्रथम अकारण उपजा है, पीछे से देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश पदार्थों की मर्यादा हुई है, और बन्धन व मोक्ष की नीति हुई है । वह ज्यों की त्यों है, जैसे जल शीतल ही है और अग्नि उष्ण ही है । जब जीव आत्मसत्ता में जागता है; तब कारण-कार्य सहित जगत् नहीं दिखता ।

स्वप्नसृष्टि प्रथम अकारण भासित होती है और जब दृढ़ हो जाती है, तब कारण से कार्य होता है, वह दृढ़ हो जाता है, जैसे मृत्तिका बिना घट नहीं बनता, पर जाग उठने में सब जगत् आत्मरूप हो जाता है । हे वधिक ! यह जगत् संवेदन में स्थित है । जब तक अहं-भाव जगता है, तब तक जगत् है और जब अहंभाव मिटता है तब सब जगत् शून्य आकाश सा हो जाता है । जब तक अहं जगता है, तब तक नाना प्रकार का जगत् दिखता है और जैसी भावना होती है वैसा दिखता है । सब पदार्थ सर्वदा अपनी-अपनी शक्ति में और जैसे आदि नीति हुई है, वैसे ही स्थित हैं । जो जीव जैसी क्रिया का अभ्यास करेगा, उसका वैसा फल पावेगा । जो बन्धन के निमित्त अभ्यास करेगा वह बन्धन पावेगा और जो मोक्ष के निमित्त अभ्यास करेगा वह मोक्ष पावेगा—ऐसी ही आदि नीति हुई है । हे वधिक ! इस प्रकार किञ्चन होकर मिट जाता है । आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है । जगत् का

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उत्पत्ति और प्रलय ऐसे हैं, जैसे हाथी अपनी सूँड़ को फैलावे और खींचे। ऐसे ही चित्तसंवेदन के फैलने से जगत् की उत्पत्ति होती है और निस्पन्द से प्रलय हो जाता है।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे कार्यकारणाकारणनिर्णयो नाम द्विशताधिकैकत्रिंशत्तमसर्गः ॥ २३१ ॥

मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! यह सम्पूर्ण जगत् चित्अणु के ओज में है और उस सम्बन्ध के अभ्यास से आत्मा चित्अणु की संज्ञा पाता है। ओज, अन्तःकरण और हृदय, तीनों अभिन्न हैं। चैतन्यसत्ता उसमें स्थित है, जो बाह्यदृष्टि में मृतकवत् है, और उनमें जीवितरूप है और वहाँ बड़े प्रकाश से प्रकाशित होती है। उस सत्ता का पहले चित्त से संयोग हुआ है। फिर चित्त और प्राणकला का संयोग हुआ है। हे वधिक ! जब प्राण क्षोभ को प्राप्त होते हैं, तब चित्त खेद को प्राप्त होता है और जब चित्त को खेद होता है, तब प्राण भी खेद को प्राप्त होते हैं। जब प्राण स्थित होते हैं, तब जीव शान्ति पाता है। जो प्राण स्थित नहीं होते तो जीव जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति, तीनों अवस्थाओं में भटकता है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था भिन्न-भिन्न होती है। हे वधिक ! जब यह पुरुष अन्न भोजन करता है, तब वह अन्न जाग्रत्वाली नाड़ी पर स्थित होता है। तब वह नाड़ी रुक जाती है। उससे सुषुप्ति आती है। जिन नाड़ियों में गई हुई चित्त की वृत्ति जाग्रत् जगत् को देखती है, वे जाग्रत् नाड़ी कहाती हैं। उन पर अन्न जाकर स्थित होता है। चित्त-सत्ता चित्त में प्रतिबिम्बित है। यह चित्तनाड़ी उसके तले आ जाती है, तब प्राणवायु भी उस नाड़ी में ठहर जाता है। जब चित्त का स्पन्दन भी ठहर जाता है, तब सुषुप्ति होती है। जो पित्त बहुत होता है तो सूर्य, अग्नि आदि उष्ण पदार्थ स्वप्न में दिखते हैं। जब वह अन्न पचता है और उन नाड़ियों में प्राण जाते हैं, तब स्वप्न अवस्था आती है। जब जल के सोखने को वायु बहती है, तब जीव स्वप्न में उड़ता है। जब कफ बहुत होता है, तब जल को देखता है, नदियाँ तालाब आदि देखता है और जाकर उनमें डूबता है। जब उष्ण नाड़ी में अन्न-जल पहुँचता

❋ निर्वाण प्रकरण ❋

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है, तब जाग्रत् अवस्था होती है। इसी प्रकार जीव तीनों अवस्थाओं में भटकता है। जगत् न भीतर है और न बाहर, केवल अद्वैतमत्ता ज्यों की त्यों है। उसके प्रमाद से चित्त की वृत्ति जब बहिर्मुख जगती है, तब जीव जगत् को जाग्रत् देखता है। जब बाहर की इन्द्रियों को त्यागकर भीतर आती है तब भीतर स्वप्न-जगत् देखता है। और जब अपने स्वभाव में स्थित होती है, तब और कल्पना मिट जाती है, सब ब्रह्म ही भासित होता है। इससे सब कल्पना को त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जाग्रत्स्वप्न सुषुप्तिविचारो नाम द्विशताधिकद्वात्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ २३२ ॥

मुनीश्वर बोले, हे बधिक! ये तीनों अवस्था आती और जाती हैं। इनका अनुभव करनेवाली जो सत्ता है, वह आत्मसत्ता है। वह सदा एक रस है। जिस पुरुष को अपने स्वरूप का अनुभव हुआ है, उसको अपना किञ्चन भासित होता है और जिसको प्रमाद है, उसको जगत् दिखता है। यह जगत् चित्त की कल्पना है। जिसको स्वरूप का प्रमाद है, उसको जगत् दिखता है। जब इन्द्रियाँ विषयों के सम्मुख होती हैं, तब जगत् देखती हैं, और उस संकल्प-जगत् को देखकर राग-द्वेषयुक्त होती हैं। फिर इन्द्रियों के विषय पाकर जीव हर्ष-शोक पाता है। हे बधिक! जिस चित्तअणु का इन्द्रियों से सम्बन्ध है, उसको संसार का अभाव नहीं होता। जीव, नेत्र, त्वचा, जिह्वा, नासिका और श्रोत्र इन्द्रियों से देखता, स्पर्श करता, रस लेता, सूँघता, सुनता और मानता है। तब संसारी होकर दुःख पाता है। जब इनके विषयों को त्यागकर अपने स्वभाव की ओर आता है, तब सब जगत् को आत्मरूप जानकर सुखी होता है। हे बधिक! चित्त के फुरने का नाम जगत् है और चित्त के स्थिर होने का नाम ब्रह्म है—जगत् और कुछ वस्तु नहीं, इसी का आभास है। चित्त के आश्रित सब नाड़ी हैं। उनमें स्थित होकर जीव तीनों अवस्थाएँ देखता है, पर वास्तव में जीव चिदाकाश आत्मा है—अज्ञान से जीवसंज्ञा पाई है।

७४२ ❁ योगवाशिष्ठ ❁

हे वधिक ! ओज धातु जो हृदय है, उसमें चित्तअणु स्थित होकर दीपक की ज्योति सा प्रकाशता है । उसी के ओज के आश्रित सब नाड़ी हैं । वे अपने-अपने रस को ग्रहण करती हैं । जब प्राणी भोजन करता है और अन्न जाग्रत् नाड़ी में पूर्ण होता है, तब जाग्रत् का अभाव हो जाता है और चित्त की वृत्ति और प्राण आने-जाने में रहित हो जाते हैं—वह नाड़ी मुँद जाती है । फिर जब कफनाड़ी में प्राण जगते हैं, तब स्वप्न दिखता है । हे वधिक ! जब इन्द्रियों को ग्रहण करके चित्त की वृत्ति बाहर निकलती है, तब जाग्रत् जगत् होकर भासित होता है । जब तन्मात्रा को लेकर चित्त की वृत्ति ओज धातु में फुरती है, तब स्वप्न आता है । जब ओज धातु पर अन्न आदि पदार्थ का बोझ पड़ता है, तब सुषुप्ति होती है । जब निद्रा और जाग्रत् का जोर होता है, तब दोनों दिखते हैं, और जब दोनों में से एक का बल अधिक होता है, तब वही जाग्रत् अथवा सुषुप्ति भासित होती है । जब निद्रा मे रहित मन्द संकल्प होता है, तब उसको मनोराज्य कहते हैं और जब बाह्य विषयों को त्यागकर चित्त की वृत्ति अन्तर्मुख होती है तब स्वप्न होता है । वही जिस सिद्धान्त में जाता है, उसके अनुसार भीतर जगत् दिखता है । कफ के बल से चन्द्रमा, क्षीरसमुद्र, नदियाँ, जल में पूर्ण तालाब, और वृक्ष, फूल, फल, बागीचे, सुन्दर वन, हिमालय, कल्पवृक्ष, तमाल, सुन्दर स्त्रियाँ, बेलें, बावलियाँ इत्यादि सुन्दर और शीतल स्थान देखता है । जब पित्त का बल अधिक होता है, तब सूर्य, अग्नि और सूखे वृक्ष, फल और टाम देखता है; सन्ध्याकाल के मेघ की लाली देखता है; वन और दूसरे स्थानों में अग्नि जगी देखता है और पृथ्वी, तपी हुई रेती और मरुस्थल की नदी दिखती है; जल उष्ण लगता है; हिमालय का शिखर भी उष्ण लगता है और नाना उष्ण पदार्थ दिखते हैं । जब वायु का बल अधिक होता है, तब स्वप्न में अधिक वायु देखता है । पाषाण की वर्षा होती दिखती है; अपने को अन्धे कूप में गिरता देखता है । हाथी-घोड़े उड़ते दिखते हैं । मनुष्य अपने को उड़ता फिरता देखता है; अपसरा के पीछे दौड़ता है । पहाड़ों की वर्षा होती है,

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७४३

वायु तीक्ष्णवेग से चलती और अन्न आदि पदार्थ जलते दिखते हैं और विपरीत होकर भासित होते हैं ।

इस प्रकार जीव वात, पित्त और कफ से स्वप्न में जगत् देखता है और जिसका बल विशेष होता है, वह उस धर्म में देख पड़ता है । वासना के अनुसार जीव न्यूनाधिक राजस, तामस और सात्त्विक पदार्थ देखता है । और जब तीनों इकट्ठे होकर कुपित होते हैं, तब प्रलयकाल देख पड़ता है । हे वधिक ! जब तक वात, पित्त और कफ के अंश के साथ मिली हुई पुर्यष्टका कफ के स्थान में प्रवेश करती है, तब तक समान जल के क्षोभ दिखते हैं । इसी प्रकार वात, पित्त और कफ जिसके स्थान में जाता है और अन्य स्वभाव को लेता है, उसको तब तक समान क्षोभ भासित होता है । जब केवल वात का क्षोभ होता है, तब महाप्रलय, काल के पवन चलते और पहाड़ पर पहाड़ गिरते और भूकम्प आदि क्षोभ होते दिखते हैं । जब कफ का क्षोभ होता है, तब समुद्र उमड़ते हैं । पित्त से अग्नि लगती है और महाप्रलय की नाईं तत्त्व क्षोभ को प्राप्त होते हैं । जब प्राण जाग्रत् नाड़ी में जाते हैं और वह अन्न से पूर्ण होती है, तब संवित् उसके नीचे आ जाती है । जैसे भीत के नीचे मेढक आवे; पत्थर की शिला में कीड़ा आ जावे और काठ की पुतली काठ में हो—जैसे इनमें अवकाश नहीं रहता, वैसे ही और नाड़ी में फुरने का अवकाश नहीं रहता, रुक जाती है । तब इसको सुषुप्ति होती है ।

जब कुछ अन्न पचता है, तब चित्संवित् अपने भीतर स्वप्न देखती है । जिसको जिसका विकार विशेष होता है, वह उसी का कार्य देखता है । जब अन्न और जल पचता है, तब जीव फिर जाग्रत् जगत् देखता है; और जब जाग्रत् और स्वप्न दोनों का बल सम होता है, तब दोनों को देखता और अनुभव करता है । हे वधिक ! इसी प्रकार तीनों अवस्था होती और मिट जाती हैं, सो तीनों गुणों से होती हैं । इनका द्रष्टा इनका अनुभव करनेवाला है । वह माया के गुणों से अतीत और सबका आत्मा है । यह जगत् और स्वप्न-जगत् संकल्पमात्र है, कुछ बना नहीं । ब्रह्मसत्ता ही किञ्चन करके जगत्रूप होकर भासित होती

७४४ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

है । परन्तु अज्ञानी उसको जगत् जानते हैं, और जगत् को सत्य जानकर इष्ट-अनिष्ट में राग-द्वेष करते हैं । जब बाहर की इन्द्रियाँ सुषुप्ति हो जाती हैं, तब जीव भीतर स्वप्न में भटकता है और उसमें सूर्य, चन्द्रमा, वन, फूल, फल, वृक्ष आदि जगत् देखता है । परन्तु जब स्वरूप का अनुभव होता है, तब सब भटकना मिट जाता है और शान्ति मिलती है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिवर्णनं नाम द्विशताधिकत्रयस्त्रिंशत्तमःसर्गः ॥ २३३ ॥

वधिक बोला, हे मुनीश्वर ! उस पुरुष के हृदय में तुमने जगत् और प्रलय देखा था । उसके बाद क्या किया और क्या अवस्था देखी ?

मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! उसके चित्तस्पन्दन में मैंने देखा कि बड़े-बड़े पहाड़ प्रलय की वायु से सूखे तृण की नाईं उड़ते हैं और पत्थरों की वर्षा होती है । इस प्रकार मैंने प्रलय के क्षोभ को देखा । मेरे देखते-देखते जाग्रत्वाली नाड़ी में अन्न स्थित हुआ तो वहाँ जो अन्न के दाने गिरे वे पर्वत जैसे दिखे । चित्तस्पन्दन जो संवित् थी, वह रोकी गई । उसमें स्थित मैं तामस नरक में जा पड़ा-जैसे वहाँ मैं भी जड़ हो गया और मुझको कुछ ज्ञान न रहा । जब कुछ अन्न पचा और कुछ अवकाश हुआ, तब प्राण का स्पन्दन जगा और जैसे निस्पन्द हुई वायु स्पन्दित होकर चले, वैसे ही वहाँ संवित् फुरी, तब सुषुप्ति दृश्य होकर भासित होने लगी-मानों आत्मा द्रष्टा ही दृश्यरूप होकर भासित होने लगा । परन्तु और कुछ नहीं बना । जैसे अग्नि और उष्णता, जल और द्रवता और मिर्च और तीक्ष्णता में भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और दृश्य में कुछ भेद नहीं । हे वधिक ! इस प्रकार मैंने जगत् को देखा और सुषुप्ति से जाग्रत् दृश्य उपजा भासित हुआ और मुझको दृष्टि आई-जैसे कुमार्ग कन्या से सन्तान उपजे ! वधिक बोला, हे मुनीश्वर ! जो सुषुप्ति आत्मा में दृश्य उपजी, वह सुषुप्ति क्या है ? जिसमें तुम दब गये थे, वही क्या सुषुप्ति है, जिससे जगत् उपजता है ?

मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! जहाँ सब सम्बन्धों का अभाव है, केवल

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ७४५

आत्मसत्ता से भिन्न कुछ कहना नहीं बनता, उसका नाम सुषुप्ति है। और उसमें जो स्फुरण हुआ, उसके तीन पर्याय हैं, वे सब सन्मात्र में हैं। जो वस्तु देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है, वह सन्मात्र है। उस सन्मात्र में और कुछ बना नहीं; उसके जो पर्याय हैं, वे ही रूप हैं। वही सत्य वस्तु अपने आपमें विराजती है और कदापि अन्यथाभाव को नहीं प्राप्त होती। किञ्चन में भी वही रूप है और अकिञ्चन में भी वही रूप है।

आत्मा का ही नाम सुषुप्ति है और उसी से सब जगत् होता है। जिस सत्ता का नाम सुषुप्ति है, वही स्वप्नदृश्य होकर भासती है—उससे भिन्न कुछ नहीं। जैसे वायु निस्पन्द व स्पन्दन में वही रूप है, वैसे ही आत्मा दोनों अवस्थाओं में एक ही है। हे बधिक! हम सरीखों की बुद्धि में और कुछ नहीं बना, आत्मा ही सदा ज्यों का त्यों स्थित है। शरीर के आदि में भी और अन्त में भी वही रूप है। उसमें जो किञ्चन द्वारा भासित हुआ है, वह भी वही रूप है। सुषुप्ति अवस्था में मुझको अद्वैत का अनुभव होता है और कहीं फुरना नहीं होता। उसमें जो स्वप्न और जाग्रत् भासित होती है, वह भी वही रूप है और जिसमें फुरती और जिसमें भासती है, उससे भिन्न कुछ नहीं। इससे यह जगत् आत्मा का किञ्चन आत्मरूप है। जब तू जागकर देखेगा, तब तुझको आत्मरूप ही दिखेगा। जैसे स्वप्नपुर और संकल्पनगर का जो अनुभव होता है, वह आकाशरूप है, वैसे ही यह जगत् आकाशरूप है, और शक्ति भी वही है। सर्वशक्ति आत्मा निष्किञ्चन और किञ्चन भी है। शून्य भी वही है, जो वाणी से कहा नहीं जाता। उस अवस्था में ज्ञानी स्थित है। हे बधिक! ज्ञानवान् को प्रत्यक्ष करके अनुभवरूप ही दिखता है। जैसे स्वप्न में जीव और ईश्वर भिन्न-भिन्न दिखते हैं और उपाधि से अनुभवभेद भासित होता है—वास्तव में कुछ भेद नहीं, वैसे ही जाग्रत् में अज्ञान उपाधि से भेद दिखता है, पर स्वरूप से आत्मा एकरूप है और जब अज्ञान निवृत्त होता है, तब सब आत्मरूप ही दिखता है।

हे बधिक! सब जगत् अपना स्वरूप है, परन्तु अज्ञान से भेद होता

७४६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

है । जब आपको जाने, तब द्वैत भेद भी मिट जावे । जैसे किसी पुरुष ने अपनी भुजा पर सिंह की मूर्ति लिखी हो और उसके भय से दौड़ता फिरे और कष्ट पावे तो वह प्रमाद से भयभीत होता है, क्योंकि वह तो अपना ही अङ्ग है । अपने अङ्ग के जानने से भय मिट जाता है । वैसे ही स्वरूप के ज्ञान से जगत्-भय मिट जाता है । जैसे स्वप्न में अज्ञान में नानात्व भासित होता है, पर बना कुछ नहीं, वैसे ही जाग्रत् में नानात्व भासित होता है, परन्तु बना कुछ नहीं । जब मनुष्य अन्तर्मुख होता है, तब बोध की दृढ़ता हो जाती है । जैसे प्रातःकाल को ज्यों-ज्यों सूर्य की किरणें प्रकट होती हैं, त्यों-त्यों सूर्यमुखी कमल खिलते हैं, वैसे ही ज्यों-ज्यों मनुष्य अन्तर्मुख होता है, त्यों-त्यों बोध खिलता है । विषयों से वैराग्य और आत्मा के अभ्यास में बुद्धि अन्तर्मुख होकर आत्मपद की प्राप्ति होती है । तब आत्मा सर्वत्र एकरस दिखता है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सुषुप्तिवर्णनन्नाम द्विशताधिकचतुस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ २३४ ॥

मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! तब मैंने उसकी सुषुप्ति से जागकर जगत् को देखा—जैसे कोई पुरुष समुद्र से निकल आवे, जैसे संकल्प सृष्टि प्रकट हो, जैसे आकाश में बादल उठते हैं और वृक्ष से फल निकल आते हैं, वैसे ही उसकी सुषुप्ति से सृष्टि निकल आई--मानो आकाश से उड़ आई वा मानो कल्पवृक्ष से चिन्तामणि निकल आई । जैसे शरीर के रोम खड़े हो आते हैं, जैसे गन्धर्वनगर प्रकट होता है, अथवा जैसे पृथ्वी से अंकुर निकल आता है, वैसे ही सृष्टि प्रकट हुई जैसे भीत पर पुतलियाँ लिखी हों और जैसे खंभे में पुतलियाँ हों, वैसे ही मैंने सृष्टि को देखा । जैसे खम्भ में पुतलियाँ निकलती नहीं, परन्तु शिल्पी कल्पना करता है कि इतनी पुतलियाँ निकलेंगी, वैसे ही अनहोनी सृष्टि आत्मरूप स्तम्भ में निकल आती है । आत्मरूपी मिट्टी से पदार्थरूपी पात्र निकलते हैं, परन्तु यह आश्चर्य है कि आकाश में चित्र होते हैं, और निराकार चैतन्य आकाश में मनुष्य

## ❇ निर्वाण प्रकरण ❇ <span style="float:right;">७४७</span>

पुतलियों की कल्पना करता है। हे बधिक! जैसे आकाश में मकड़ी के समूह निकल आते हैं, वैसे ही शून्याकाश से सृष्टि निकलकर उस पुरुष के हृदय में मुझको स्पष्ट दिखने लगी।

देश, काल, क्रिया और द्रव्य से अकस्मात् सत्यासत्य पदार्थ दिखने लगते हैं और असत्य पदार्थ सत्य भासित होते हैं। जैसे मणि-मंत्र औषध-द्रव्य के बल से असत्य पदार्थ सत्य भासित होने लगते हैं, और सत्य पदार्थ असत्य लगते हैं, वैसे ही अभ्यास के बल से मुझको उस पुरुष के हृदय में सृष्टि दिखने लगी। हे बधिक! जैसा निश्चय संवित् में दृढ़ होता है, वैसे ही रूप होकर भासित होता है, वास्तव में न कोई पदार्थ है, न भीतर है, न बाहर है, न जाग्रत् है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति है। यह सब सृष्टि इसके भीतर ही स्थित है। जीव प्रमाददोष से उसे बाहर से उत्पन्न होते देखता है। जैसे स्वप्न में सब पदार्थ अपने भीतर-बाहर होते दिखते हैं, वैसे ही ये पदार्थ अपने भीतर से बाहर निकलते भासित होते हैं। हे बधिक! यह जगत् जो आकारसंयुक्त दिखता है, सो सब निराकार है, कुछ बना नहीं, ब्रह्मसत्ता ही अज्ञान से जगद्रूप दिखती है। जो ज्ञानवान् पुरुष है, उनको जगत् सत्य-असत्य कुछ नहीं भासित होता, केवल ब्रह्मसत्ता ही अपने रूप में स्थित दीखती है। और जो अज्ञानी हैं, उनको भिन्न-भिन्न नाम रूप भासित होते हैं। जब चित्त की वृत्ति बाह्य फुरती है, उसको जाग्रत कहते हैं, जब अन्तर में फुरती है, तब उसको स्वप्न कहते हैं। और जब स्थिर होती है, तब उसको सुषुप्ति कहते हैं। तो एक ही चित्तवृत्ति के तीन पर्याय हुए, कुछ वास्तव में नहीं। जगत् के आदि में शुद्ध केवल आत्मसत्ता थी। उसमें जब चित्तसंविद् जगी, तब जगत् रूप दिखने लगा। किसी कारण से जगत् नहीं उपजा। जिसका कारण कोई नहीं, उसको असत्य जानिये—वास्तव में कुछ बना नहीं, सब जगत् शान्तरूप ब्रह्म ही है।

**इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे सुषुप्तिवर्णनन्नाम द्विशताधिकपञ्चत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ २३५ ॥**

**बधिक बोला,** हे मुनीश्वर! प्रलय के बाद तुमको क्या अनुभव

७४८ ✻ योगवासिष्ठ ✻

हुआ था ? मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! तब मुझको उसके भीतर सृष्टि उपजती देख पड़ी । अपने पुत्र, कलत्र, स्त्री आदि सम्पूर्ण कुटुम्ब देख पड़ा । उनको देखकर मुझमें ममता जगी और पूर्व स्मृति भूल गई । अपनी षोडशवर्ष की आयु दिखी । मैं गृहस्थाश्रम में स्थित हुआ । तब रागद्वेषसहित मुझको जीव के धर्म फुर आये, क्योंकि मुझको दृढ़ बोध न हुआ था । हे वधिक ! जब दृढ़बोध होता है, तब राग-द्वेषादिक जीव-धर्म चला नहीं सकते और संसार को सत्य जानकर कोई वासना नहीं होती, इस कारण जीव चलायमान नहीं होता । जिसको बोध की दृढ़ता नहीं हुई, उसको जगत् का वासना खींच ले जाती है । हे वधिक ! अब मुझको दृढ़बोध हुआ है । इस वासना को तरना महा-कठिन है । यह पिशाचिनी महाबली है । चिरकाल से दृश्य का अभ्यास होने के कारण यह चला ले जाती है । जब सत्शास्त्र का विचार और सन्तों का संग जीव को प्राप्त होता है और अभ्यास दृढ़ होता है, तब दृश्य का सद्भाव निवृत्त हो जाता है । जब तक यह मोक्ष का उपाय नहीं प्राप्त होता, तब तक यह भ्रम दृढ़ रहता है । जब सन्तों के संग और सत्शास्त्रों के विचार से यह विचार उपजता है कि 'मैं कौन हूँ' और 'यह जगत् क्या है' और इसको विचारकर आत्मपद का दृढ़ अभ्यास होता है, तब दृश्यभ्रम मिट जाता है, क्योंकि असम्यग्ज्ञान से जगत् सत् भासित हुआ है । जब सम्यग्ज्ञान हुआ, तब जगत् का सद्भाव कैसे रहे ? जैसे आकाश में नीलता, बाजीगर की बाजी और रस्सी में सर्प भ्रम से दीखते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् भ्रम से भासित होता है । जब प्राणी अपने स्वरूप में जागता है, तब जगद्भ्रम मिट जाता है; पर जब तक जीव स्वरूप में नहीं जागता, तब तक जगद्भ्रम नहीं मिटता ।

वधिक बोला, हे मुनीश्वर ! यह तुम सत्य कहते हो कि जगद्भ्रम मिटना कठिन है । मैं तुम्हारे मुख से बारम्बार सुनता हूँ और विचारता हूँ, मुझको पद पदार्थ का ज्ञान भी दृढ़ हो गया है । परन्तु संसारभ्रम नष्ट नहीं होता । यह मैं जानता और सुनता हूँ कि सन्तों के संग और

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७४६

सतशास्त्रों के विचार बिना शान्ति नहीं होती, पर यह संशय मुझको होता है कि तुम जाग्रत् जगत् को स्वप्नवत् कैसे कहते हो ? कई पदार्थ सत्य लगते हैं और कई असत्य लगते हैं। मुनीश्वर बोले, हे बधिक ! यह सब जगत् पृथ्वी आदिक पदार्थ सत्य दिखते हैं और शश के सींग आदि असत्य दिखते हैं, सो सब मिथ्या हैं। जैसे स्वप्न में जो सत्य-असत्य पदार्थ दिखते हैं, सो सब असत्य हैं, वैसे ही यह जगत् असत्य है, पर उसमें अल्प और चिरकाल की प्रतीति का भेद है। जाग्रत् चिरकाल की प्रतीति है, उसमें पदार्थ सत्य भासते हैं और स्वप्न अल्पकाल की प्रतीति है। इससे स्वप्न के पदार्थ असत्य दिखते हैं। परन्तु दोनों भ्रमरूप और असत्य हैं, इस कारण मैं तुल्य कहता हूँ। असत्य पदार्थ ही भ्रम से सत्य की नाईं दिखते हैं। यह सब जगत् स्वप्नमात्र है। उसमें सत्य और असत्य किसे कहूँ। जैसे स्वप्न में कई पदार्थ सत्य और कई असत्य भासित होते हैं, पर सभी असत्य हैं, वैसे ही जाग्रत् में कई पदार्थ सत्य और कई असत्य भासित होते हैं, परन्तु दोनों भ्रममात्र हैं, इसी से असत्य हैं। हे बधिक ! प्रतीति का भेद है, पदार्थ में कुछ भेद नहीं। जिसमें प्रतीति दृढ़ हो रही है, उसको सत्य कहते हैं, और जिसमें प्रतीति दृढ़ नहीं, उसको असत्य कहते हैं। एक ऐसे पदार्थ हैं कि स्वप्न में उनकी भावना दृढ़ हो गई है। वे जाग्रत् में भी प्रत्यक्ष दिखते हैं। मनोराज्य की दृढ़ता जो जाग्रतरूप हो जाती है, वह भावना ही की दृढ़ता है, और भेद नहीं। जिसमें भावना दृढ़ हो गई है, वह सत्य भासने लगा है। जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, उनको जगत् संकल्पमात्र ही भासता है। संकल्प से भिन्न जगत् का कुछ रूप नहीं, तो उसमें सत्य और असत्य किसे कहूँ ?

सब जगत् भ्रममात्र है। जो ज्ञानवान् हैं, उनको सत्य-असत्य कुछ नहीं। सब ज्ञानरूप ही दिखता है। जैसे जिसको स्वप्न में जाग्रत की स्मृति आई है, उसको फिर स्वप्न नहीं आता है, वैसे ही जिसको स्वप्न में भी स्वरूप का बोध हुआ है, उसका फिर जन्म नहीं होता। इससे न कोई जाग्रत् है, न कोई स्वप्न है और न कोई नीति है, क्योंकि नीति

७५०

❊ योगवाशिष्ठ ❊

भी कुछ और वस्तु नहीं। जैसे स्वप्न में नाना प्रकार के पदार्थ दिखते हैं और उनकी मर्यादा नीति भी भासित होती है तो वह नीति किससे है ? सब ज्ञानरूप होती है। वैसे ही जाग्रत् में भी सब ज्ञानरूप है और संवित् के फुरने से नाना प्रकार के पदार्थ दिखते हैं। उसमें नीति भी भासित होती है। इससे न कोई जगत् है और न कोई नीति । इसका कारण कोई नहीं । कारण बिना ही जगत् अकस्मात् उपजता और मिट भी जाता है। संवेदन के जगने से जगत् प्रकट होता है और संवेदन के मिटने से मिट जाता है—इससे जगत् संवेदनरूप है। जैसे वायु स्पन्दनरूप होती है, वैसे ही संवेदन ही जगत्रूप होकर दिखता है। जैसे वायु स्पन्दनरूप होती है, तब स्फुरणरूप होकर भासित होती है और निस्पन्द को कोई नहीं जानता, परन्तु वायु को दोनों तुल्य हैं; वैसे ही चित्तसंवेदन के फुरने में जगत् दिखता है और ठहरने में जगत् किञ्चन मिट जाता है—फुरना और ठहरना दोनों उसके किञ्चन हैं, और वह आप दोनों में तुल्य है।

हे वधिक ! नीति भी अज्ञानी को समझाने के लिए कही है। स्वप्न भी असत्य है, यह सब जानते हैं, पर स्वप्न का वृत्तान्त जाग्रत् में सिद्ध होता दिखता है। कोई कहता है कि रात्रि में मुझको स्वप्न हुआ है कि अमुक कार्य इस प्रकार होगा, और जाग्रत् में वैसा ही होता दिखता है। पिता पुत्र से कह जाता है कि मेरी गति करना और अमुक स्थान से द्रव्य गड़ा है, उसे तुम निकाल लो । सो यह उसी प्रकार होता देखा गया है। जो नीति होती तो कोई कार्य सिद्ध न होता, पर वह तो होता है, इससे नीति भी कुछ वस्तु नहीं । आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु नहीं । जाग्रत् उसका नाम है, जिसे आत्मा कहते हैं। जिसको तुम जाग्रत् कहते हो वह कुछ वस्तु नहीं । जाग्रत् मन-सहित षट्इन्द्रियों का संवेदन होता है। वह स्वप्न में भी मनसहित षट्इन्द्रियों का संवेदन होता है और उनसे विषयों का ग्रहण होता है। इससे जाग्रत् कुछ वस्तु नहीं। जो अर्थ जाग्रत् में सिद्ध होता है, वह स्वप्न में भी सिद्ध हो तो जाग्रत् कुछ वस्तु न हुई। और जो तू कहे

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

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कि स्वप्न कुछ वस्तु है तो स्वप्न भी कुछ वस्तु नहीं; क्योंकि स्वप्न वहाँ होता है, जहाँ निद्राभ्रम होता है । जगत् केवल शुद्ध चिन्मात्रसत्ता का किञ्चन है । जैसे रत्नों की चमक स्थिर होती है, सो रत्नों से भिन्न कुछ वस्तु नहीं, रत्न ही उसमें व्यापा है, वैसे ही जाग्रत् व स्वप्न का जगत् आत्मा का चमत्कार है । बोधसत्ता केवल अपने आपमें स्थित है । वह अनन्त है । उसमें जगत् कुछ बना नहीं । जो आत्मा से भिन्न जगत् दिखता है, वह नाशवान् है । आत्मा सदा अविनाशी है । हे बधिक ! जब यह पुरुष शरीर को छोड़ता है, तब परलोक में सुख-दुःख ऐसे भोगता है, जैसे जल में तरङ्ग उठकर मिट जाता है और दूसरी जगह और प्रकार से उठता है, सो जल ही जल है । पहले भी जल था, पीछे भी जल है, तरङ्ग भी जल है और जल ही का विलास इस प्रकार फुरता है । वैसे ही यह शरीर भी अनुभवरूप है—अनुभव से भिन्न कुछ नहीं ।

जैसे मनुष्य एक स्वप्न को छोड़कर दूसरा स्वप्न देखता है तो क्या है; अपना ही रूप है, वैसे ही यह जगत् भी आत्मरूप है । हे बधिक ! जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय ये ही चारों वपु हैं जाग्रत् सृष्टि की समष्टिता है, उसका नाम विराट् है । स्वप्न लिङ्ग शरीर की समष्टिता है, उसका नाम हिरण्यगर्भ है । सुषुप्ति शरीर की समष्टिता अव्याकृत माया है और तुरीय सब शरीरों की समष्टिता है । यह चैतन्यरूप आत्मा है । तुरीय साक्षीभूत के जानने को कहते हैं । उसकी समष्टितारूप चैतन्य वपु है । चारों शरीर उसके हैं । वह सदा निराकार अचेत चिन्मात्र है । हे बधिक ! ये चारों परमात्मा के शरीर हैं । वह परमात्मा निराकार है । आकार जो उसमें दिखता है, वह भी वही रूप है । आकार कल्पनामात्र है और आत्मा सब कल्पना से रहित है—इससे सब जगत् चिदाकाशरूप है । जैसे पत्थर की शिला में कमल के फूल नहीं लगते--उनका होना असंभव है, वैसे ही आत्मा में जगत् का होना असंभव है । हे बधिक ! आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है । तू जागकर देख कि सब पदार्थ संकल्पमात्र हैं और जिसमें कल्पित हैं, वह नामरूप से

७५२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

रहित है। जब तू उसको देखेगा तब सब जगत् आत्मरूप प्रतीत होगा।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे स्वप्ननिर्णयो नाम द्विशताधिकषट्त्रिंशत्तमस्सर्गः॥२३६॥

बधिक बोला, हे मुनीश्वर ! उस पुरुष के हृदय में जो सृष्टि देखी थी, उसमें तुम किस प्रकार विचरते थे और क्या देखा था, सो कहो। मुनीश्वर बोले, हे बधिक ! जब मैंने उसके हृदय में नाना प्रकार का जगत् देखा, तब मैं अपने कुटुम्ब में रहने लगा। पहले की स्मृति भूलकर सोलह वर्ष तक उसी को सत्य जानकर चेष्टा करता रहा। तब मेरे गृह में माननीय उग्रतपा नाम के एक ऋषीश्वर आये। उनका मैंने बहुत आदर किया। उनके चरण धोकर मैंने सिंहासन पर बिठाया और नाना प्रकार के भोज्य पदार्थों से उनको तृप्त किया। जब उन ऋषि ने भोजन करके विश्राम किया, तब मैंने कहा, हे ऋषीश्वर ! यह मैं जानता हूँ कि तुम परमज्ञानी हो, क्योंकि अपने रूप आत्मतत्त्व को आप ही जानते हो। जब तुम आये थे, तब थके हुए थे, परन्तु तुममें क्रोध न देख पड़ा, और जब तुमने नाना प्रकार के भोजन किये, तब तुम हर्षित भी नहीं हुए। इस कारण मैंने जाना कि तुम परम बोधवान् हो और तुममें राग-द्वेष कुछ नहीं है। इससे मैं संशययुक्त होकर एक प्रश्न करता हूँ, कृपा करके उसका उत्तर देकर मेरे संशय को दूर कीजिये। हे भगवन् ! इस जगत् में जो दुर्भिक्ष पड़ता है और सब इकट्ठे मर जाते और कष्ट पाते हैं, इसका क्या कारण है ? यह तो मैं जानता हूँ कि जैसे शुभ अथवा अशुभ कर्म जीव करता है, उनका फल पाता है। जैसे धान को बोता है तो समय पाकर फल भी अवश्य आता है; वैसे ही कर्म का फल भी अवश्य प्राप्त होता है। और जिसने कर्म किया है, वही फल भी भोगता है, पर दुर्भिक्ष में इकट्ठा कष्ट क्योंकर प्राप्त होता है ? उग्रतपा बोले, हे साधो ! प्रथम यह सुनो कि जगत् क्या वस्तु है। यह जगत् कारण बिना उत्पन्न हुआ है और जो कारण बिना देख पड़े, उसे भ्रममात्र जानिये। इससे तुम विचारकर देखो कि 'यह जगत् क्या है' तुम 'कौन हो' 'इसमें क्या हैं' और 'इसका अन्त कहाँ तक है' ?