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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1547, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1547

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७४३

वायु तीक्ष्णवेग से चलती और अन्न आदि पदार्थ जलते दिखते हैं और विपरीत होकर भासित होते हैं ।

इस प्रकार जीव वात, पित्त और कफ से स्वप्न में जगत् देखता है और जिसका बल विशेष होता है, वह उस धर्म में देख पड़ता है । वासना के अनुसार जीव न्यूनाधिक राजस, तामस और सात्त्विक पदार्थ देखता है । और जब तीनों इकट्ठे होकर कुपित होते हैं, तब प्रलयकाल देख पड़ता है । हे वधिक ! जब तक वात, पित्त और कफ के अंश के साथ मिली हुई पुर्यष्टका कफ के स्थान में प्रवेश करती है, तब तक समान जल के क्षोभ दिखते हैं । इसी प्रकार वात, पित्त और कफ जिसके स्थान में जाता है और अन्य स्वभाव को लेता है, उसको तब तक समान क्षोभ भासित होता है । जब केवल वात का क्षोभ होता है, तब महाप्रलय, काल के पवन चलते और पहाड़ पर पहाड़ गिरते और भूकम्प आदि क्षोभ होते दिखते हैं । जब कफ का क्षोभ होता है, तब समुद्र उमड़ते हैं । पित्त से अग्नि लगती है और महाप्रलय की नाईं तत्त्व क्षोभ को प्राप्त होते हैं । जब प्राण जाग्रत् नाड़ी में जाते हैं और वह अन्न से पूर्ण होती है, तब संवित् उसके नीचे आ जाती है । जैसे भीत के नीचे मेढक आवे; पत्थर की शिला में कीड़ा आ जावे और काठ की पुतली काठ में हो—जैसे इनमें अवकाश नहीं रहता, वैसे ही और नाड़ी में फुरने का अवकाश नहीं रहता, रुक जाती है । तब इसको सुषुप्ति होती है ।

जब कुछ अन्न पचता है, तब चित्संवित् अपने भीतर स्वप्न देखती है । जिसको जिसका विकार विशेष होता है, वह उसी का कार्य देखता है । जब अन्न और जल पचता है, तब जीव फिर जाग्रत् जगत् देखता है; और जब जाग्रत् और स्वप्न दोनों का बल सम होता है, तब दोनों को देखता और अनुभव करता है । हे वधिक ! इसी प्रकार तीनों अवस्था होती और मिट जाती हैं, सो तीनों गुणों से होती हैं । इनका द्रष्टा इनका अनुभव करनेवाला है । वह माया के गुणों से अतीत और सबका आत्मा है । यह जगत् और स्वप्न-जगत् संकल्पमात्र है, कुछ बना नहीं । ब्रह्मसत्ता ही किञ्चन करके जगत्रूप होकर भासित होती