योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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हे वधिक ! ओज धातु जो हृदय है, उसमें चित्तअणु स्थित होकर दीपक की ज्योति सा प्रकाशता है । उसी के ओज के आश्रित सब नाड़ी हैं । वे अपने-अपने रस को ग्रहण करती हैं । जब प्राणी भोजन करता है और अन्न जाग्रत् नाड़ी में पूर्ण होता है, तब जाग्रत् का अभाव हो जाता है और चित्त की वृत्ति और प्राण आने-जाने में रहित हो जाते हैं—वह नाड़ी मुँद जाती है । फिर जब कफनाड़ी में प्राण जगते हैं, तब स्वप्न दिखता है । हे वधिक ! जब इन्द्रियों को ग्रहण करके चित्त की वृत्ति बाहर निकलती है, तब जाग्रत् जगत् होकर भासित होता है । जब तन्मात्रा को लेकर चित्त की वृत्ति ओज धातु में फुरती है, तब स्वप्न आता है । जब ओज धातु पर अन्न आदि पदार्थ का बोझ पड़ता है, तब सुषुप्ति होती है । जब निद्रा और जाग्रत् का जोर होता है, तब दोनों दिखते हैं, और जब दोनों में से एक का बल अधिक होता है, तब वही जाग्रत् अथवा सुषुप्ति भासित होती है । जब निद्रा मे रहित मन्द संकल्प होता है, तब उसको मनोराज्य कहते हैं और जब बाह्य विषयों को त्यागकर चित्त की वृत्ति अन्तर्मुख होती है तब स्वप्न होता है । वही जिस सिद्धान्त में जाता है, उसके अनुसार भीतर जगत् दिखता है । कफ के बल से चन्द्रमा, क्षीरसमुद्र, नदियाँ, जल में पूर्ण तालाब, और वृक्ष, फूल, फल, बागीचे, सुन्दर वन, हिमालय, कल्पवृक्ष, तमाल, सुन्दर स्त्रियाँ, बेलें, बावलियाँ इत्यादि सुन्दर और शीतल स्थान देखता है । जब पित्त का बल अधिक होता है, तब सूर्य, अग्नि और सूखे वृक्ष, फल और टाम देखता है; सन्ध्याकाल के मेघ की लाली देखता है; वन और दूसरे स्थानों में अग्नि जगी देखता है और पृथ्वी, तपी हुई रेती और मरुस्थल की नदी दिखती है; जल उष्ण लगता है; हिमालय का शिखर भी उष्ण लगता है और नाना उष्ण पदार्थ दिखते हैं । जब वायु का बल अधिक होता है, तब स्वप्न में अधिक वायु देखता है । पाषाण की वर्षा होती दिखती है; अपने को अन्धे कूप में गिरता देखता है । हाथी-घोड़े उड़ते दिखते हैं । मनुष्य अपने को उड़ता फिरता देखता है; अपसरा के पीछे दौड़ता है । पहाड़ों की वर्षा होती है,