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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1545, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1545

❋ निर्वाण प्रकरण ❋

७४१

है, तब जाग्रत् अवस्था होती है। इसी प्रकार जीव तीनों अवस्थाओं में भटकता है। जगत् न भीतर है और न बाहर, केवल अद्वैतमत्ता ज्यों की त्यों है। उसके प्रमाद से चित्त की वृत्ति जब बहिर्मुख जगती है, तब जीव जगत् को जाग्रत् देखता है। जब बाहर की इन्द्रियों को त्यागकर भीतर आती है तब भीतर स्वप्न-जगत् देखता है। और जब अपने स्वभाव में स्थित होती है, तब और कल्पना मिट जाती है, सब ब्रह्म ही भासित होता है। इससे सब कल्पना को त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जाग्रत्स्वप्न सुषुप्तिविचारो नाम द्विशताधिकद्वात्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ २३२ ॥

मुनीश्वर बोले, हे बधिक! ये तीनों अवस्था आती और जाती हैं। इनका अनुभव करनेवाली जो सत्ता है, वह आत्मसत्ता है। वह सदा एक रस है। जिस पुरुष को अपने स्वरूप का अनुभव हुआ है, उसको अपना किञ्चन भासित होता है और जिसको प्रमाद है, उसको जगत् दिखता है। यह जगत् चित्त की कल्पना है। जिसको स्वरूप का प्रमाद है, उसको जगत् दिखता है। जब इन्द्रियाँ विषयों के सम्मुख होती हैं, तब जगत् देखती हैं, और उस संकल्प-जगत् को देखकर राग-द्वेषयुक्त होती हैं। फिर इन्द्रियों के विषय पाकर जीव हर्ष-शोक पाता है। हे बधिक! जिस चित्तअणु का इन्द्रियों से सम्बन्ध है, उसको संसार का अभाव नहीं होता। जीव, नेत्र, त्वचा, जिह्वा, नासिका और श्रोत्र इन्द्रियों से देखता, स्पर्श करता, रस लेता, सूँघता, सुनता और मानता है। तब संसारी होकर दुःख पाता है। जब इनके विषयों को त्यागकर अपने स्वभाव की ओर आता है, तब सब जगत् को आत्मरूप जानकर सुखी होता है। हे बधिक! चित्त के फुरने का नाम जगत् है और चित्त के स्थिर होने का नाम ब्रह्म है—जगत् और कुछ वस्तु नहीं, इसी का आभास है। चित्त के आश्रित सब नाड़ी हैं। उनमें स्थित होकर जीव तीनों अवस्थाएँ देखता है, पर वास्तव में जीव चिदाकाश आत्मा है—अज्ञान से जीवसंज्ञा पाई है।