योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1544, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें७४० ❇ योगवासिष्ठ ❇
उत्पत्ति और प्रलय ऐसे हैं, जैसे हाथी अपनी सूँड़ को फैलावे और खींचे। ऐसे ही चित्तसंवेदन के फैलने से जगत् की उत्पत्ति होती है और निस्पन्द से प्रलय हो जाता है।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे कार्यकारणाकारणनिर्णयो नाम द्विशताधिकैकत्रिंशत्तमसर्गः ॥ २३१ ॥
मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! यह सम्पूर्ण जगत् चित्अणु के ओज में है और उस सम्बन्ध के अभ्यास से आत्मा चित्अणु की संज्ञा पाता है। ओज, अन्तःकरण और हृदय, तीनों अभिन्न हैं। चैतन्यसत्ता उसमें स्थित है, जो बाह्यदृष्टि में मृतकवत् है, और उनमें जीवितरूप है और वहाँ बड़े प्रकाश से प्रकाशित होती है। उस सत्ता का पहले चित्त से संयोग हुआ है। फिर चित्त और प्राणकला का संयोग हुआ है। हे वधिक ! जब प्राण क्षोभ को प्राप्त होते हैं, तब चित्त खेद को प्राप्त होता है और जब चित्त को खेद होता है, तब प्राण भी खेद को प्राप्त होते हैं। जब प्राण स्थित होते हैं, तब जीव शान्ति पाता है। जो प्राण स्थित नहीं होते तो जीव जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति, तीनों अवस्थाओं में भटकता है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था भिन्न-भिन्न होती है। हे वधिक ! जब यह पुरुष अन्न भोजन करता है, तब वह अन्न जाग्रत्वाली नाड़ी पर स्थित होता है। तब वह नाड़ी रुक जाती है। उससे सुषुप्ति आती है। जिन नाड़ियों में गई हुई चित्त की वृत्ति जाग्रत् जगत् को देखती है, वे जाग्रत् नाड़ी कहाती हैं। उन पर अन्न जाकर स्थित होता है। चित्त-सत्ता चित्त में प्रतिबिम्बित है। यह चित्तनाड़ी उसके तले आ जाती है, तब प्राणवायु भी उस नाड़ी में ठहर जाता है। जब चित्त का स्पन्दन भी ठहर जाता है, तब सुषुप्ति होती है। जो पित्त बहुत होता है तो सूर्य, अग्नि आदि उष्ण पदार्थ स्वप्न में दिखते हैं। जब वह अन्न पचता है और उन नाड़ियों में प्राण जाते हैं, तब स्वप्न अवस्था आती है। जब जल के सोखने को वायु बहती है, तब जीव स्वप्न में उड़ता है। जब कफ बहुत होता है, तब जल को देखता है, नदियाँ तालाब आदि देखता है और जाकर उनमें डूबता है। जब उष्ण नाड़ी में अन्न-जल पहुँचता