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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1543, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1543

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ७३६

उपजी है और जैसे उपजी है वैसे ही स्थित है फिर पदार्थ जो एक भाव को त्यागकर और भाव को अङ्गीकार करते हैं, सो कारण से करते हैं ? कारण बिना नहीं होते । क्योंकि प्रथम सृष्टि अकारण हुई है और पीछे से सृष्टिकाल में कारण-कार्य हुए हैं । परन्तु हे वधिक ! जिन पुरुषों को आत्मा का साक्षात्कार हुआ है, उनको यह जगत् कारण के बिना ब्रह्मस्वरूप भासित होता है और जिनको आत्मसत्ता का प्रमाद है, उनको कार्य-कारण सत्य भासित होता है । परन्तु आत्मा ब्रह्म निराकार अकारण है उसमें संवेदन के फुरने से अब्रह्मता भासित होती है; निराकार में आकार भासित होता है और अकारण में कारण भासित होता है । जब संवेदन, जो मन का जगना है, वह स्थिर हो जाता है, तब सब जगत् कारण-कार्य सहित दिखता है । पर प्रथम अकारण उपजा है, पीछे से देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश पदार्थों की मर्यादा हुई है, और बन्धन व मोक्ष की नीति हुई है । वह ज्यों की त्यों है, जैसे जल शीतल ही है और अग्नि उष्ण ही है । जब जीव आत्मसत्ता में जागता है; तब कारण-कार्य सहित जगत् नहीं दिखता ।

स्वप्नसृष्टि प्रथम अकारण भासित होती है और जब दृढ़ हो जाती है, तब कारण से कार्य होता है, वह दृढ़ हो जाता है, जैसे मृत्तिका बिना घट नहीं बनता, पर जाग उठने में सब जगत् आत्मरूप हो जाता है । हे वधिक ! यह जगत् संवेदन में स्थित है । जब तक अहं-भाव जगता है, तब तक जगत् है और जब अहंभाव मिटता है तब सब जगत् शून्य आकाश सा हो जाता है । जब तक अहं जगता है, तब तक नाना प्रकार का जगत् दिखता है और जैसी भावना होती है वैसा दिखता है । सब पदार्थ सर्वदा अपनी-अपनी शक्ति में और जैसे आदि नीति हुई है, वैसे ही स्थित हैं । जो जीव जैसी क्रिया का अभ्यास करेगा, उसका वैसा फल पावेगा । जो बन्धन के निमित्त अभ्यास करेगा वह बन्धन पावेगा और जो मोक्ष के निमित्त अभ्यास करेगा वह मोक्ष पावेगा—ऐसी ही आदि नीति हुई है । हे वधिक ! इस प्रकार किञ्चन होकर मिट जाता है । आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है । जगत् का