योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1548, कुल 1734 में से
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है । परन्तु अज्ञानी उसको जगत् जानते हैं, और जगत् को सत्य जानकर इष्ट-अनिष्ट में राग-द्वेष करते हैं । जब बाहर की इन्द्रियाँ सुषुप्ति हो जाती हैं, तब जीव भीतर स्वप्न में भटकता है और उसमें सूर्य, चन्द्रमा, वन, फूल, फल, वृक्ष आदि जगत् देखता है । परन्तु जब स्वरूप का अनुभव होता है, तब सब भटकना मिट जाता है और शान्ति मिलती है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिवर्णनं नाम द्विशताधिकत्रयस्त्रिंशत्तमःसर्गः ॥ २३३ ॥
वधिक बोला, हे मुनीश्वर ! उस पुरुष के हृदय में तुमने जगत् और प्रलय देखा था । उसके बाद क्या किया और क्या अवस्था देखी ?
मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! उसके चित्तस्पन्दन में मैंने देखा कि बड़े-बड़े पहाड़ प्रलय की वायु से सूखे तृण की नाईं उड़ते हैं और पत्थरों की वर्षा होती है । इस प्रकार मैंने प्रलय के क्षोभ को देखा । मेरे देखते-देखते जाग्रत्वाली नाड़ी में अन्न स्थित हुआ तो वहाँ जो अन्न के दाने गिरे वे पर्वत जैसे दिखे । चित्तस्पन्दन जो संवित् थी, वह रोकी गई । उसमें स्थित मैं तामस नरक में जा पड़ा-जैसे वहाँ मैं भी जड़ हो गया और मुझको कुछ ज्ञान न रहा । जब कुछ अन्न पचा और कुछ अवकाश हुआ, तब प्राण का स्पन्दन जगा और जैसे निस्पन्द हुई वायु स्पन्दित होकर चले, वैसे ही वहाँ संवित् फुरी, तब सुषुप्ति दृश्य होकर भासित होने लगी-मानों आत्मा द्रष्टा ही दृश्यरूप होकर भासित होने लगा । परन्तु और कुछ नहीं बना । जैसे अग्नि और उष्णता, जल और द्रवता और मिर्च और तीक्ष्णता में भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और दृश्य में कुछ भेद नहीं । हे वधिक ! इस प्रकार मैंने जगत् को देखा और सुषुप्ति से जाग्रत् दृश्य उपजा भासित हुआ और मुझको दृष्टि आई-जैसे कुमार्ग कन्या से सन्तान उपजे ! वधिक बोला, हे मुनीश्वर ! जो सुषुप्ति आत्मा में दृश्य उपजी, वह सुषुप्ति क्या है ? जिसमें तुम दब गये थे, वही क्या सुषुप्ति है, जिससे जगत् उपजता है ?
मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! जहाँ सब सम्बन्धों का अभाव है, केवल