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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1549, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1549

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ७४५

आत्मसत्ता से भिन्न कुछ कहना नहीं बनता, उसका नाम सुषुप्ति है। और उसमें जो स्फुरण हुआ, उसके तीन पर्याय हैं, वे सब सन्मात्र में हैं। जो वस्तु देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है, वह सन्मात्र है। उस सन्मात्र में और कुछ बना नहीं; उसके जो पर्याय हैं, वे ही रूप हैं। वही सत्य वस्तु अपने आपमें विराजती है और कदापि अन्यथाभाव को नहीं प्राप्त होती। किञ्चन में भी वही रूप है और अकिञ्चन में भी वही रूप है।

आत्मा का ही नाम सुषुप्ति है और उसी से सब जगत् होता है। जिस सत्ता का नाम सुषुप्ति है, वही स्वप्नदृश्य होकर भासती है—उससे भिन्न कुछ नहीं। जैसे वायु निस्पन्द व स्पन्दन में वही रूप है, वैसे ही आत्मा दोनों अवस्थाओं में एक ही है। हे बधिक! हम सरीखों की बुद्धि में और कुछ नहीं बना, आत्मा ही सदा ज्यों का त्यों स्थित है। शरीर के आदि में भी और अन्त में भी वही रूप है। उसमें जो किञ्चन द्वारा भासित हुआ है, वह भी वही रूप है। सुषुप्ति अवस्था में मुझको अद्वैत का अनुभव होता है और कहीं फुरना नहीं होता। उसमें जो स्वप्न और जाग्रत् भासित होती है, वह भी वही रूप है और जिसमें फुरती और जिसमें भासती है, उससे भिन्न कुछ नहीं। इससे यह जगत् आत्मा का किञ्चन आत्मरूप है। जब तू जागकर देखेगा, तब तुझको आत्मरूप ही दिखेगा। जैसे स्वप्नपुर और संकल्पनगर का जो अनुभव होता है, वह आकाशरूप है, वैसे ही यह जगत् आकाशरूप है, और शक्ति भी वही है। सर्वशक्ति आत्मा निष्किञ्चन और किञ्चन भी है। शून्य भी वही है, जो वाणी से कहा नहीं जाता। उस अवस्था में ज्ञानी स्थित है। हे बधिक! ज्ञानवान् को प्रत्यक्ष करके अनुभवरूप ही दिखता है। जैसे स्वप्न में जीव और ईश्वर भिन्न-भिन्न दिखते हैं और उपाधि से अनुभवभेद भासित होता है—वास्तव में कुछ भेद नहीं, वैसे ही जाग्रत् में अज्ञान उपाधि से भेद दिखता है, पर स्वरूप से आत्मा एकरूप है और जब अज्ञान निवृत्त होता है, तब सब आत्मरूप ही दिखता है।

हे बधिक! सब जगत् अपना स्वरूप है, परन्तु अज्ञान से भेद होता

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 1549, कुल 1734 में से · BharatKosha