योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1550, कुल 1734 में से
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है । जब आपको जाने, तब द्वैत भेद भी मिट जावे । जैसे किसी पुरुष ने अपनी भुजा पर सिंह की मूर्ति लिखी हो और उसके भय से दौड़ता फिरे और कष्ट पावे तो वह प्रमाद से भयभीत होता है, क्योंकि वह तो अपना ही अङ्ग है । अपने अङ्ग के जानने से भय मिट जाता है । वैसे ही स्वरूप के ज्ञान से जगत्-भय मिट जाता है । जैसे स्वप्न में अज्ञान में नानात्व भासित होता है, पर बना कुछ नहीं, वैसे ही जाग्रत् में नानात्व भासित होता है, परन्तु बना कुछ नहीं । जब मनुष्य अन्तर्मुख होता है, तब बोध की दृढ़ता हो जाती है । जैसे प्रातःकाल को ज्यों-ज्यों सूर्य की किरणें प्रकट होती हैं, त्यों-त्यों सूर्यमुखी कमल खिलते हैं, वैसे ही ज्यों-ज्यों मनुष्य अन्तर्मुख होता है, त्यों-त्यों बोध खिलता है । विषयों से वैराग्य और आत्मा के अभ्यास में बुद्धि अन्तर्मुख होकर आत्मपद की प्राप्ति होती है । तब आत्मा सर्वत्र एकरस दिखता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सुषुप्तिवर्णनन्नाम द्विशताधिकचतुस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ २३४ ॥
मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! तब मैंने उसकी सुषुप्ति से जागकर जगत् को देखा—जैसे कोई पुरुष समुद्र से निकल आवे, जैसे संकल्प सृष्टि प्रकट हो, जैसे आकाश में बादल उठते हैं और वृक्ष से फल निकल आते हैं, वैसे ही उसकी सुषुप्ति से सृष्टि निकल आई--मानो आकाश से उड़ आई वा मानो कल्पवृक्ष से चिन्तामणि निकल आई । जैसे शरीर के रोम खड़े हो आते हैं, जैसे गन्धर्वनगर प्रकट होता है, अथवा जैसे पृथ्वी से अंकुर निकल आता है, वैसे ही सृष्टि प्रकट हुई जैसे भीत पर पुतलियाँ लिखी हों और जैसे खंभे में पुतलियाँ हों, वैसे ही मैंने सृष्टि को देखा । जैसे खम्भ में पुतलियाँ निकलती नहीं, परन्तु शिल्पी कल्पना करता है कि इतनी पुतलियाँ निकलेंगी, वैसे ही अनहोनी सृष्टि आत्मरूप स्तम्भ में निकल आती है । आत्मरूपी मिट्टी से पदार्थरूपी पात्र निकलते हैं, परन्तु यह आश्चर्य है कि आकाश में चित्र होते हैं, और निराकार चैतन्य आकाश में मनुष्य