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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1551, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1551
## ❇ निर्वाण प्रकरण ❇ <span style="float:right;">७४७</span>

पुतलियों की कल्पना करता है। हे बधिक! जैसे आकाश में मकड़ी के समूह निकल आते हैं, वैसे ही शून्याकाश से सृष्टि निकलकर उस पुरुष के हृदय में मुझको स्पष्ट दिखने लगी।

देश, काल, क्रिया और द्रव्य से अकस्मात् सत्यासत्य पदार्थ दिखने लगते हैं और असत्य पदार्थ सत्य भासित होते हैं। जैसे मणि-मंत्र औषध-द्रव्य के बल से असत्य पदार्थ सत्य भासित होने लगते हैं, और सत्य पदार्थ असत्य लगते हैं, वैसे ही अभ्यास के बल से मुझको उस पुरुष के हृदय में सृष्टि दिखने लगी। हे बधिक! जैसा निश्चय संवित् में दृढ़ होता है, वैसे ही रूप होकर भासित होता है, वास्तव में न कोई पदार्थ है, न भीतर है, न बाहर है, न जाग्रत् है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति है। यह सब सृष्टि इसके भीतर ही स्थित है। जीव प्रमाददोष से उसे बाहर से उत्पन्न होते देखता है। जैसे स्वप्न में सब पदार्थ अपने भीतर-बाहर होते दिखते हैं, वैसे ही ये पदार्थ अपने भीतर से बाहर निकलते भासित होते हैं। हे बधिक! यह जगत् जो आकारसंयुक्त दिखता है, सो सब निराकार है, कुछ बना नहीं, ब्रह्मसत्ता ही अज्ञान से जगद्रूप दिखती है। जो ज्ञानवान् पुरुष है, उनको जगत् सत्य-असत्य कुछ नहीं भासित होता, केवल ब्रह्मसत्ता ही अपने रूप में स्थित दीखती है। और जो अज्ञानी हैं, उनको भिन्न-भिन्न नाम रूप भासित होते हैं। जब चित्त की वृत्ति बाह्य फुरती है, उसको जाग्रत कहते हैं, जब अन्तर में फुरती है, तब उसको स्वप्न कहते हैं। और जब स्थिर होती है, तब उसको सुषुप्ति कहते हैं। तो एक ही चित्तवृत्ति के तीन पर्याय हुए, कुछ वास्तव में नहीं। जगत् के आदि में शुद्ध केवल आत्मसत्ता थी। उसमें जब चित्तसंविद् जगी, तब जगत् रूप दिखने लगा। किसी कारण से जगत् नहीं उपजा। जिसका कारण कोई नहीं, उसको असत्य जानिये—वास्तव में कुछ बना नहीं, सब जगत् शान्तरूप ब्रह्म ही है।

**इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे सुषुप्तिवर्णनन्नाम द्विशताधिकपञ्चत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ २३५ ॥**

**बधिक बोला,** हे मुनीश्वर! प्रलय के बाद तुमको क्या अनुभव