योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1552, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें७४८ ✻ योगवासिष्ठ ✻
हुआ था ? मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! तब मुझको उसके भीतर सृष्टि उपजती देख पड़ी । अपने पुत्र, कलत्र, स्त्री आदि सम्पूर्ण कुटुम्ब देख पड़ा । उनको देखकर मुझमें ममता जगी और पूर्व स्मृति भूल गई । अपनी षोडशवर्ष की आयु दिखी । मैं गृहस्थाश्रम में स्थित हुआ । तब रागद्वेषसहित मुझको जीव के धर्म फुर आये, क्योंकि मुझको दृढ़ बोध न हुआ था । हे वधिक ! जब दृढ़बोध होता है, तब राग-द्वेषादिक जीव-धर्म चला नहीं सकते और संसार को सत्य जानकर कोई वासना नहीं होती, इस कारण जीव चलायमान नहीं होता । जिसको बोध की दृढ़ता नहीं हुई, उसको जगत् का वासना खींच ले जाती है । हे वधिक ! अब मुझको दृढ़बोध हुआ है । इस वासना को तरना महा-कठिन है । यह पिशाचिनी महाबली है । चिरकाल से दृश्य का अभ्यास होने के कारण यह चला ले जाती है । जब सत्शास्त्र का विचार और सन्तों का संग जीव को प्राप्त होता है और अभ्यास दृढ़ होता है, तब दृश्य का सद्भाव निवृत्त हो जाता है । जब तक यह मोक्ष का उपाय नहीं प्राप्त होता, तब तक यह भ्रम दृढ़ रहता है । जब सन्तों के संग और सत्शास्त्रों के विचार से यह विचार उपजता है कि 'मैं कौन हूँ' और 'यह जगत् क्या है' और इसको विचारकर आत्मपद का दृढ़ अभ्यास होता है, तब दृश्यभ्रम मिट जाता है, क्योंकि असम्यग्ज्ञान से जगत् सत् भासित हुआ है । जब सम्यग्ज्ञान हुआ, तब जगत् का सद्भाव कैसे रहे ? जैसे आकाश में नीलता, बाजीगर की बाजी और रस्सी में सर्प भ्रम से दीखते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् भ्रम से भासित होता है । जब प्राणी अपने स्वरूप में जागता है, तब जगद्भ्रम मिट जाता है; पर जब तक जीव स्वरूप में नहीं जागता, तब तक जगद्भ्रम नहीं मिटता ।
वधिक बोला, हे मुनीश्वर ! यह तुम सत्य कहते हो कि जगद्भ्रम मिटना कठिन है । मैं तुम्हारे मुख से बारम्बार सुनता हूँ और विचारता हूँ, मुझको पद पदार्थ का ज्ञान भी दृढ़ हो गया है । परन्तु संसारभ्रम नष्ट नहीं होता । यह मैं जानता और सुनता हूँ कि सन्तों के संग और