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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1553, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1553

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७४६

सतशास्त्रों के विचार बिना शान्ति नहीं होती, पर यह संशय मुझको होता है कि तुम जाग्रत् जगत् को स्वप्नवत् कैसे कहते हो ? कई पदार्थ सत्य लगते हैं और कई असत्य लगते हैं। मुनीश्वर बोले, हे बधिक ! यह सब जगत् पृथ्वी आदिक पदार्थ सत्य दिखते हैं और शश के सींग आदि असत्य दिखते हैं, सो सब मिथ्या हैं। जैसे स्वप्न में जो सत्य-असत्य पदार्थ दिखते हैं, सो सब असत्य हैं, वैसे ही यह जगत् असत्य है, पर उसमें अल्प और चिरकाल की प्रतीति का भेद है। जाग्रत् चिरकाल की प्रतीति है, उसमें पदार्थ सत्य भासते हैं और स्वप्न अल्पकाल की प्रतीति है। इससे स्वप्न के पदार्थ असत्य दिखते हैं। परन्तु दोनों भ्रमरूप और असत्य हैं, इस कारण मैं तुल्य कहता हूँ। असत्य पदार्थ ही भ्रम से सत्य की नाईं दिखते हैं। यह सब जगत् स्वप्नमात्र है। उसमें सत्य और असत्य किसे कहूँ। जैसे स्वप्न में कई पदार्थ सत्य और कई असत्य भासित होते हैं, पर सभी असत्य हैं, वैसे ही जाग्रत् में कई पदार्थ सत्य और कई असत्य भासित होते हैं, परन्तु दोनों भ्रममात्र हैं, इसी से असत्य हैं। हे बधिक ! प्रतीति का भेद है, पदार्थ में कुछ भेद नहीं। जिसमें प्रतीति दृढ़ हो रही है, उसको सत्य कहते हैं, और जिसमें प्रतीति दृढ़ नहीं, उसको असत्य कहते हैं। एक ऐसे पदार्थ हैं कि स्वप्न में उनकी भावना दृढ़ हो गई है। वे जाग्रत् में भी प्रत्यक्ष दिखते हैं। मनोराज्य की दृढ़ता जो जाग्रतरूप हो जाती है, वह भावना ही की दृढ़ता है, और भेद नहीं। जिसमें भावना दृढ़ हो गई है, वह सत्य भासने लगा है। जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, उनको जगत् संकल्पमात्र ही भासता है। संकल्प से भिन्न जगत् का कुछ रूप नहीं, तो उसमें सत्य और असत्य किसे कहूँ ?

सब जगत् भ्रममात्र है। जो ज्ञानवान् हैं, उनको सत्य-असत्य कुछ नहीं। सब ज्ञानरूप ही दिखता है। जैसे जिसको स्वप्न में जाग्रत की स्मृति आई है, उसको फिर स्वप्न नहीं आता है, वैसे ही जिसको स्वप्न में भी स्वरूप का बोध हुआ है, उसका फिर जन्म नहीं होता। इससे न कोई जाग्रत् है, न कोई स्वप्न है और न कोई नीति है, क्योंकि नीति