योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1554, कुल 1734 में से
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❊ योगवाशिष्ठ ❊
भी कुछ और वस्तु नहीं। जैसे स्वप्न में नाना प्रकार के पदार्थ दिखते हैं और उनकी मर्यादा नीति भी भासित होती है तो वह नीति किससे है ? सब ज्ञानरूप होती है। वैसे ही जाग्रत् में भी सब ज्ञानरूप है और संवित् के फुरने से नाना प्रकार के पदार्थ दिखते हैं। उसमें नीति भी भासित होती है। इससे न कोई जगत् है और न कोई नीति । इसका कारण कोई नहीं । कारण बिना ही जगत् अकस्मात् उपजता और मिट भी जाता है। संवेदन के जगने से जगत् प्रकट होता है और संवेदन के मिटने से मिट जाता है—इससे जगत् संवेदनरूप है। जैसे वायु स्पन्दनरूप होती है, वैसे ही संवेदन ही जगत्रूप होकर दिखता है। जैसे वायु स्पन्दनरूप होती है, तब स्फुरणरूप होकर भासित होती है और निस्पन्द को कोई नहीं जानता, परन्तु वायु को दोनों तुल्य हैं; वैसे ही चित्तसंवेदन के फुरने में जगत् दिखता है और ठहरने में जगत् किञ्चन मिट जाता है—फुरना और ठहरना दोनों उसके किञ्चन हैं, और वह आप दोनों में तुल्य है।
हे वधिक ! नीति भी अज्ञानी को समझाने के लिए कही है। स्वप्न भी असत्य है, यह सब जानते हैं, पर स्वप्न का वृत्तान्त जाग्रत् में सिद्ध होता दिखता है। कोई कहता है कि रात्रि में मुझको स्वप्न हुआ है कि अमुक कार्य इस प्रकार होगा, और जाग्रत् में वैसा ही होता दिखता है। पिता पुत्र से कह जाता है कि मेरी गति करना और अमुक स्थान से द्रव्य गड़ा है, उसे तुम निकाल लो । सो यह उसी प्रकार होता देखा गया है। जो नीति होती तो कोई कार्य सिद्ध न होता, पर वह तो होता है, इससे नीति भी कुछ वस्तु नहीं । आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु नहीं । जाग्रत् उसका नाम है, जिसे आत्मा कहते हैं। जिसको तुम जाग्रत् कहते हो वह कुछ वस्तु नहीं । जाग्रत् मन-सहित षट्इन्द्रियों का संवेदन होता है। वह स्वप्न में भी मनसहित षट्इन्द्रियों का संवेदन होता है और उनसे विषयों का ग्रहण होता है। इससे जाग्रत् कुछ वस्तु नहीं। जो अर्थ जाग्रत् में सिद्ध होता है, वह स्वप्न में भी सिद्ध हो तो जाग्रत् कुछ वस्तु न हुई। और जो तू कहे