योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1555, कुल 1734 में से
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कि स्वप्न कुछ वस्तु है तो स्वप्न भी कुछ वस्तु नहीं; क्योंकि स्वप्न वहाँ होता है, जहाँ निद्राभ्रम होता है । जगत् केवल शुद्ध चिन्मात्रसत्ता का किञ्चन है । जैसे रत्नों की चमक स्थिर होती है, सो रत्नों से भिन्न कुछ वस्तु नहीं, रत्न ही उसमें व्यापा है, वैसे ही जाग्रत् व स्वप्न का जगत् आत्मा का चमत्कार है । बोधसत्ता केवल अपने आपमें स्थित है । वह अनन्त है । उसमें जगत् कुछ बना नहीं । जो आत्मा से भिन्न जगत् दिखता है, वह नाशवान् है । आत्मा सदा अविनाशी है । हे बधिक ! जब यह पुरुष शरीर को छोड़ता है, तब परलोक में सुख-दुःख ऐसे भोगता है, जैसे जल में तरङ्ग उठकर मिट जाता है और दूसरी जगह और प्रकार से उठता है, सो जल ही जल है । पहले भी जल था, पीछे भी जल है, तरङ्ग भी जल है और जल ही का विलास इस प्रकार फुरता है । वैसे ही यह शरीर भी अनुभवरूप है—अनुभव से भिन्न कुछ नहीं ।
जैसे मनुष्य एक स्वप्न को छोड़कर दूसरा स्वप्न देखता है तो क्या है; अपना ही रूप है, वैसे ही यह जगत् भी आत्मरूप है । हे बधिक ! जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय ये ही चारों वपु हैं जाग्रत् सृष्टि की समष्टिता है, उसका नाम विराट् है । स्वप्न लिङ्ग शरीर की समष्टिता है, उसका नाम हिरण्यगर्भ है । सुषुप्ति शरीर की समष्टिता अव्याकृत माया है और तुरीय सब शरीरों की समष्टिता है । यह चैतन्यरूप आत्मा है । तुरीय साक्षीभूत के जानने को कहते हैं । उसकी समष्टितारूप चैतन्य वपु है । चारों शरीर उसके हैं । वह सदा निराकार अचेत चिन्मात्र है । हे बधिक ! ये चारों परमात्मा के शरीर हैं । वह परमात्मा निराकार है । आकार जो उसमें दिखता है, वह भी वही रूप है । आकार कल्पनामात्र है और आत्मा सब कल्पना से रहित है—इससे सब जगत् चिदाकाशरूप है । जैसे पत्थर की शिला में कमल के फूल नहीं लगते--उनका होना असंभव है, वैसे ही आत्मा में जगत् का होना असंभव है । हे बधिक ! आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है । तू जागकर देख कि सब पदार्थ संकल्पमात्र हैं और जिसमें कल्पित हैं, वह नामरूप से