योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७५२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
रहित है। जब तू उसको देखेगा तब सब जगत् आत्मरूप प्रतीत होगा।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे स्वप्ननिर्णयो नाम द्विशताधिकषट्त्रिंशत्तमस्सर्गः॥२३६॥
बधिक बोला, हे मुनीश्वर ! उस पुरुष के हृदय में जो सृष्टि देखी थी, उसमें तुम किस प्रकार विचरते थे और क्या देखा था, सो कहो। मुनीश्वर बोले, हे बधिक ! जब मैंने उसके हृदय में नाना प्रकार का जगत् देखा, तब मैं अपने कुटुम्ब में रहने लगा। पहले की स्मृति भूलकर सोलह वर्ष तक उसी को सत्य जानकर चेष्टा करता रहा। तब मेरे गृह में माननीय उग्रतपा नाम के एक ऋषीश्वर आये। उनका मैंने बहुत आदर किया। उनके चरण धोकर मैंने सिंहासन पर बिठाया और नाना प्रकार के भोज्य पदार्थों से उनको तृप्त किया। जब उन ऋषि ने भोजन करके विश्राम किया, तब मैंने कहा, हे ऋषीश्वर ! यह मैं जानता हूँ कि तुम परमज्ञानी हो, क्योंकि अपने रूप आत्मतत्त्व को आप ही जानते हो। जब तुम आये थे, तब थके हुए थे, परन्तु तुममें क्रोध न देख पड़ा, और जब तुमने नाना प्रकार के भोजन किये, तब तुम हर्षित भी नहीं हुए। इस कारण मैंने जाना कि तुम परम बोधवान् हो और तुममें राग-द्वेष कुछ नहीं है। इससे मैं संशययुक्त होकर एक प्रश्न करता हूँ, कृपा करके उसका उत्तर देकर मेरे संशय को दूर कीजिये। हे भगवन् ! इस जगत् में जो दुर्भिक्ष पड़ता है और सब इकट्ठे मर जाते और कष्ट पाते हैं, इसका क्या कारण है ? यह तो मैं जानता हूँ कि जैसे शुभ अथवा अशुभ कर्म जीव करता है, उनका फल पाता है। जैसे धान को बोता है तो समय पाकर फल भी अवश्य आता है; वैसे ही कर्म का फल भी अवश्य प्राप्त होता है। और जिसने कर्म किया है, वही फल भी भोगता है, पर दुर्भिक्ष में इकट्ठा कष्ट क्योंकर प्राप्त होता है ? उग्रतपा बोले, हे साधो ! प्रथम यह सुनो कि जगत् क्या वस्तु है। यह जगत् कारण बिना उत्पन्न हुआ है और जो कारण बिना देख पड़े, उसे भ्रममात्र जानिये। इससे तुम विचारकर देखो कि 'यह जगत् क्या है' तुम 'कौन हो' 'इसमें क्या हैं' और 'इसका अन्त कहाँ तक है' ?