योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1557, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७५३
हे वधिक ! यह जगत् स्वप्नमात्र है और यह शरीर भी स्वप्न ही है। तू मेरा स्वप्ननर है; मैं तेरा स्वप्ननर हूँ और सब जगत् स्वप्नरूप है। कारण-कार्य कोई नहीं, सब आभासमात्र है। आभास में कुछ और वस्तु नहीं होती। इससे सब जगत् आत्मस्वरूप है। जैसे रस्सी में सर्प भ्रममात्र होता है, वह सर्प नहीं, रस्सी ही है, वैसे ही सब जगत् चिन्मात्र-रूप है। उसमें जगत् कुछ बना नहीं। केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है, और उसमें अहँ होकर इस प्रकार चेतनता संवेदन फुरता है, तब जगत् आकार का स्मरण होता है, और जैसा-जैसा संकल्प फुरता है, वैसा ही वैसा जगत् दिखता है। जैसे स्वप्न की सृष्टि और संकल्पनगर नाना प्रकार के दिखते हैं, पर अनुभव से भिन्न नहीं, वैसे ही यह जगत् दिखता है। जिस संवित् में अपना स्वरूप विस्मृत होता है, उसको जगत् कारण कार्यरूप दिखता है—वही जीव है। और जिस संवित् को कर्म की कल्पना स्पर्श करती है, उसको उन कर्मों का फल लगता है। ज्ञानवान् कर्तव्य करता भी दिखता है, परन्तु उसके हृदय में कर्तव्य का अभिमान नहीं स्पर्श करता। जिसके हृदय में कर्तव्य का अभिमान होता है, उसको फल भी होता है।
हे साधो ! यह जो सृष्टि है, उसका एक विराट् पुरुष है। उसी का यह शरीर है। यह विराट् भी अन्य विराट् के संकल्प में है। यह विराट उस विराट् का रोमाञ्च है। जब विराट्पुरुष के अंग में क्षोभ होता है और जीव की पापवासना उदय होती है, तब वासना और अंग का क्षोभ इकट्ठा होने से उस स्थान में उपद्रव और कष्ट होता है। जैसे वन में बहुत वृक्ष होते हैं और उन पर गाज गिरती है तो उससे सब चूर्ण हो जाते हैं, वैसे ही इकट्ठे पाप से सब इकट्ठे ही मर जाते हैं और इकट्ठे दुर्भिक्ष से कष्ट पाते हैं। जैसे किसी पुरुष के अंग पर मक्खी काटे तो उससे वह अंग काँपता है और उस अंग के काँपने से रोम भी काँपने लग जाते हैं, और जो सर्पादिक जीव कहीं डसते हैं तो सारा शरीर दुखता है और सब रोम कष्ट पाते हैं, वैसे ही यह जगत् विराट् पुरुष का शरीर है जब किसी नगर में पाप उदय होता है, तब एक रोमरूपी नगर जीव कष्ट