योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1558, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें७५४ ❁ योगवाशिष्ठ ❁
पाते हैं। और जो सारे अङ्गरूपी देश में पाप उदय होता है, तो सर्प के काटने के समान विराट् का सारे शरीर में क्षोभ होता है और उसके शरीर पर रोमरूपी सब जीव कष्ट पाते हैं, आत्मसत्ता केवल अनुभव-रूप है। उसके प्रमाद से यह आपदा दृष्टि होती है। यह जगत् कारण से उपजा होता तो सत्य होता। कारण से तो उपजा नहीं, सत्य कैसे हो ? इस जगत् में सत्य प्रतीति करना ही अज्ञान है। हे साधो ! इस आकाश का कारण कोई नहीं, पृथ्वी का कारण कोई नहीं, और अविद्या का कारण भी कोई नहीं। स्वयंभू अकारण है। स्वयंभू उसका नाम है, जो अपने आपसे प्रकट है तो उसका कारण कौन हो ? अग्नि, जल, वायु का कारण भी कहीं नहीं। जो तुम कहो कि सबका कारण आत्मा है तो आत्मा को निमित्तकारण कहोगे या समवायकारण कहोगे ? यदि प्रथम पक्ष निमित्तकारण कहिये तो नहीं बनता; क्योंकि आत्मा अद्वैत है, दूसरी वस्तु कोई नहीं, तब निमित्तकारण कैसे हो ? यदि समवाय-कारण कहिये तो भी नहीं बनता; क्योंकि समवायकारण आप परिणाम करके कार्य होता है। पर आत्मा अच्युत है और अपने स्वरूप को नहीं त्यागता। वह समवायकारण कैसे हो ? इससे यदि आत्मा में कारण कार्य भाव नहीं तो फिर जगत् किसका कार्य हो ?
हे अङ्ग ! जो कारण से रहित देख पड़े, उसको जानिये कि भ्रममात्र भासित होता है, और जो तू कहे कि कारण बिना पिण्डाकार नहीं होते, कहीं कारण भी होगा, तो हे अङ्ग ! जैसे मनुष्य देह को त्यागता है और परलोक जाकर देखता है तो कर्म के अनुसार सुख-दुःख भोगता है। पर उस शरीर का कारण किसे कहिये ? वह तो कारण से नहीं उपजा, भ्रममात्र है। वैसे यह भी भ्रममात्र जानो। जैसे स्वप्न में जो नाना प्रकार के आकार प्रकट होते हैं, वे किसी कारण से नहीं उप-जते, और जैसे आकाश में तरुवर और शृङ्ग जो दिखते हैं, वे भ्रममात्र हैं, वैसे ही यह जगत् भी भ्रममात्र है। जैसे बालक को अनहोता वेताल दिखता है और उससे वह भयभीत होता है, वैसे ही यह जगत् भी अनहोता स्वरूप के प्रमाद से दिखता है। वास्तव में परमात्मसत्ता ज्यों