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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1559, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1559

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ७५५

की त्यों है, वही संवेदन से जगतरूप होकर दिखती है—उसमें वही रूप है जैसे वायु चलने और ठहरने में एक ही रूप है, परन्तु चलने से प्रतीत होती है और ठहरने से नहीं प्रतीत होती, वैसे ही चित्तसंवित् फुरने से जगत् के आकार से दिखती है और उसमें नाना प्रकार के शब्द-अर्थ दृष्टिगत होते हैं, और जब फुरने से रहित होती है, तब अपने स्वभाव को देखती है। जब संकल्प की दृढ़ता होती है, तब कारणकार्य भासित होने लगते हैं। जिसको कारणकार्य भासित होता है, उसको जगत् सत्य जान पड़ता है, और जिसको कारणकार्य से रहित दिखता है, उसको जगत् आत्मरूप है। जिसको कारणकार्य बुद्धि है, उसको वही सत्य है। वह पुण्य करेगा तो स्वर्ग में सुख पावेगा और पाप करेगा तो नरक के दुःख भोगेगा—इससे उसको पुण्य ही करना भला है। जब जीव के पाप इकट्ठे होते हैं, तब दुर्भिक्ष पड़ता और मृत्यु आती है। जैसे पत्थर की वर्षा हो, वैसे ही वे कष्ट पाते हैं। और जो मेरा निश्चय पूछो तो न पाप है, न पुण्य है, न दुःख है, न सुख है, और न जगत् है। जब स्वरूप के प्रमाद से अहं उदय होता है, तब नाना प्रकार के विकार भासित होते हैं, और जब प्रमाद निवृत्त होता है, तब सब आत्मरूप दिखता है—इससे तुम सब कल्पना त्यागकर अपने स्व-रूप में स्थित हो। तब सब संशय मिट जावेंगे।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे स्वप्नविचारो नाम द्विशताधिकसप्तत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ २३७ ॥

मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! इस प्रकार उग्रतपा ऋषीश्वर ने उपदेश किया। उससे मैं अपने स्वभाव में स्थित होकर अकृत्रिमपद को प्राप्त हुआ। उग्रतपा के साथ मानो विष्णु भगवान् उपदेश करने आकर बैठे थे, उन्हीं के उपदेश से मैं जागा। जैसे कोई धूल से सना हुआ स्नान से निर्मल हो, वैसे ही मैं शुद्ध हुआ, अपनी पूर्वस्मृति और अवस्था को स्मरणकर और समाधिवाले शरीर और आत्मवपु को भी जानकर यह उग्रतपा तुम्हारे पास बैठा है। अग्नि बोले, हे राजन् ! जब इस प्रकार मुनीश्वर ने कहा, तब वधिक को विस्मय हुआ। वह